ज़रा सा पास आकर
By Keyur Joshi
ज़रा सा पास आकर दूर जाने की बात करते हो,
मेहताब होकर मेरी शब के, तुम सहर की बात करते हो...
हम वो है जो खेल चुके ज़िन्दगी से भी,
तुम हो के लफ़्ज़ों की बात करते हो...
तुम चले जाओगे किसीको यूँही गले लगाकर,
यहाँ नज़रें नही मिलती, तुम बात करने की बात करते हो...
यह जो अंजुमन है तुम्हारा है, इंसाफ़ करो,
तुम हो के बस मुझीसे बात करते हो...
ज़िंदगी की रंजिशों से तुम वाकिफ़ नही हो क्या,
यहाँ मेरी आँख नही लगती, तुम दिल्लगी की बात करते हो...
यूँ बेमतलब की उम्मीद लगाकर हमसे, क्यों खस्ता होते हो,
इश्क़ ही मुसलसल किया है हमने, तुम रिफ़ाक़त की ही बात करते हो...
बताओ मुझे ख़फ़ा क्यों हो, दूरी ही तो है,
मेरी रूह आधी तुम्हारी है, किस क़ुर्बत की बात करते हो...
तुम खुदको साबित करते रहोगे, ज़माना खफ़ा होता रहेगा,
ये दौर ख़ामोशी का है, किसलिए बात करते हो...
आँखें पढ़ने में नाकाबिल हो तुम,
और कहते हो इश्क़ है, क्या बात करते हो...
By Keyur Joshi

Comments