ज़मीं फ़िरदौस करते हैं……..
By Vishal Chaudhary
मेरी बातों से होगा क्या,
मैं बस आईना दिखाता हूँ,
मेरे वतन को देखोगे,
आओ फिर तुम्हें दिखाता हूँ !!
पेशियों में हाज़िर यहाँ, भगवान होते हैं
बेदाग़ होकर भी, दाग़दार रहते हैं
फिर इंसान को कौन पूछे,
यहाँ मज़हब के ठेकेदार रहते हैं !!
कभी अल्लाह को कहते हैं
कभी फिर राम तौलते हैं,
ये कैसे लोग हैं मौला,
बिन सोचे ही बोलते हैं !!
सूरज नज़रबंद करके ये,
सभी चिराग़ बुझाते हैं,
फिर जलों को, और जलाते हैं
आग तो कहाँ बुझाते हैं !!
जनाजों पे ईमान ढोते हैं,
ये रोज़ ज़मीर खोते हैं,
संगदिली का रोग कैसा है
ज़रा ना आँखों से रोते हैं !!
मैंने कब कहा, मैं कुछ
काफ़िर सब ही होते हैं,
मैं भी तुम सा बुज़दिल हूँ,
बेफ़िक्र रातों में सोते हैं !!
कभी फिर शब्द रूठते हैं,
कुछ तो लफ़्ज़ टूटते हैं,
जो अगर लिखने बैठूँ तो
हाथों से कलम छूटते हैं !!
हमारा हक़ तुम्हारा शक,
इससे भी हर्ज करते हैं,
बचा लो जलते चमन को बस,
इतना ही अर्ज़ करते हैं !!
आओ,जिस्मों में होश भरते हैं,
शोलों को औस करते हैं,
सियासी आसमान तकते,
ज़मीं फ़िरदौस करते हैं !!
ज़ेहन में जंग जारी है,
उसे फिर राख़ करते हैं,
अंदर जो शख़्स बाक़ी है,
चलो, उसे फिर इंसान करते हैं !!
By Vishal Chaudhary

Comments