ज़ख्म बहुत गहरा है निशां अभी बाक़ी है
Updated: Jul 15, 2025
By Jaya Bhardwaj
थी वो पन्द्रह दिसंबर की रात, जब छूटा था पापा का हाथ।
हम भूल गये थे हर बात, बस जाना था उनके साथ।
वक्त ठहर सा गया है उस पल के साथ,
यकीं नहीं होता मिला है ये कैसा आघात।
जब सुबह और रात हुआ करती थी,
उनकी मुस्कुराहट के साथ।
अब रोज़ दिन ढ़लता है, एक नाउम्मीद शाम के साथ।
ज़ख्म बहुत गहरा है, निशां अभी बाक़ी है।
चली गई वो एक जान,
पर उनकी जान अब भी बाक़ी है।
कहने सुनने को कई फरमान अभी बाक़ी है।
पूरा करने को सभी अरमान अभी बाक़ी है।
अभी तो बस चलना सीखा था हमने,
भरने को उड़ान अभी बाक़ी है।
क्योंकि अभी तो नापी है बस मुट्ठी भर ज़मीं
अभी तो सारा आसमान बाक़ी है ।।
By Jaya Bhardwaj

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