"ज़ख़्म-ए-हयात" (Wounds of Life)
By Gursahil Gill
हर जिस्म घायल, हर रूह परेशान है
आदमी किसी का नहीं, उम्मीदों का गुलाम है
हमें जो भी मिला, उसे शिकवे-शिकायतें ही हैं जिंदगी से
कोई मिला नहीं जो कहे कि जिंदगी मेहरबान है
सब ने मंजिल पर पहुँच कर मंजिलें बदली
सो मैं ये मानूँ कि जो नहीं मिला, वही मंजिल है
जहाँ पहुँचना है, वही मुकाम है?
है सारी दुनिया की खबर, याद है सदियों का वेरवा
और जनता खुद को भी नहीं, आदमी इतना नादान है
यूं ही तो किसे शौक है बंदगी का यहाँ
जरूरतों के मुताबिक सब को याद आता भगवान है
हमने देखा जिंदगी को बहुत करीब से, तो ये जाना
यहाँ जीने से ज्यादा मरना आसान है|
By Gursahil Gill

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