चिड़ियों का शोक
By Saurabh Subhash Chand
सोसाइटी के दीवार से लगे कुछ अशोक क पेड़,
उनपर झूलती, मटकती, चेहचहाती चिड़ियाँ,
सभी घरों से, रात को छुपा के फेंका गया खाना चुगती रहती,
मेरी खिड़की से दिखता सुंदर नज़ारा,
रोज़ाना देखता हूँ..
आज सुबह उठा,
चिड़ियों की खनकती आवाज़ कानों में पड़ी,
आज कुछ ज्यादा ही चेहचहा रही थी,
मन खुश हो गया,
खिड़की से देखा,
चिड़ियाँ सोसाइटी की दीवार पे लगी तार पे बैठी,
मस्त बतिया रही थी..
वाह क्या सीन है!! मन में बोला, खुश हुआ,
और चल दिया चाय बनाने,
मन खुश हो तो काम अच्छे होते हैं,
मोंटाज देखिये..
मैं उबलती हुई खुशबूदार चाय को देख रहा हूँ,
और दिमाग में चिड़ियों की चेहचहाहट गूँज रही है,
चाय छानने लगा कि माथा ठनका,
आज चिड़ियाँ तार पे क्यों बैठी हैं,
चाय लेकर वापस खिड़की पे आया,
उफ़!! मन घबरा गया,
आज माली पेड़ों का मुंडन कर गया था,
घोसले वापस तिनके बन गए थे,
डालियाँ और पत्ते, बिखरे पड़े थे,
बहुत बढ़ रहे थे, आसरा दे रहे थे,खुश थे,
शायद पेड़ सोसाइटी के कद से बड़े थे,
इसीलिए छंट-छंटा कर, अधनंगे खड़े थे,
ख़ुद से घृणा सी हुई,
मैं अब तक चिड़ियों के दुःख में,
आनंदित हो रहा था,
अब समझा वो चिड़ियाँ दुखद रुदाली गा रही थी,
अशोक के पेड़ों के पास बैठकर, शोक मना रही थी.
By Saurabh Subhash Chand

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