चिराग
Updated: Jan 27, 2024
By Priyanka Mathur
एक टूटे हुए संदूक का हिस्सा
अचानक पैर में चुभ गया..
चोट पर से खून निकल रहा था
और गुस्सा दिमाग पर हावी हो गया..
ठान लिया, बस ठान लिया कि
आज संदूक को निकाल बाहर फेंक दूँ..!
जैसे ही संदूक उठाया
बिखर गया उसका सामान..
कुछ ख़त,टूटे खिलौने,चाबी वाला गुड्डा
साथ ही बिखर गई वो बचपन की यादें..
ख़्वाहिशें जब तब किया करते थे हम
वो करते रहते उनकों पूरा जब तक था दम..!
सोचते हुए आँख भर आई
तकलीफ चोट की हुई पराई..
पीला-सा बदरंगी कागज़ दबा हुआ था
गीले अश्को को से कुछ लिखा हुआ था..!
लिखा था कि,
बेटा हमेशा खुश रहना,जहाँ भी रहो तुम
बस एक काॅल करते रहना..
माँ को तुम्हारी आवाज़ की आदत हो गई,
तो बस उसको ही पुकार लेना तुम..
जानता हूँ बहुत व्यस्त होगे कारोबार में तुम
बस बच्चों का हाल बता दिया करना..
हफ्ते में चाहे एक दिन घर आ जाया करना
इस घर के चराग़ हो तुम..
तोहफे में मेरी दुआएं लेते जाना..
रोशन करना अपना नाम तुम
बस इस आँगन का चराग़ जलाये रखना..!
अँखियों के कोर से नीर बहता रहा
कलेजे से लगा उस ख़त को मैं चूमता रहा..
आज ना माँ है ना पिता का साया है,
फिर भी देखो किस तरह उन्होंने दिया सहारा है..
चोट जो पैर को सुलगा रही थी,
माँ का आँचल उसे सुखा रही थी और
पिता की दुआ मलहम लगा रही थी..
कुछ इस तरह से वो ,
अपने चराग़ को बुझने से बचा रही थी..!🍁
By Priyanka Mathur

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