चिठ्ठी का खोया अस्तित्व
By Priyanka Mathur
मेरे घर के एक कोने में रखी है वो अलमारी
शीशे के दरवाजे में से झांकती हैं यादें पुरानी..
वहीं पर रखा मिला मुझे अस्तित्व चिठ्ठी का
जो संजो कर रखा है मैंने यादों के पिटारे सा ..
आज भी महकता है घर का वो कोना
आती है खुशबू उनमें से मेरे अपनों की
जिनसे मुलाकातें रह गई है बस सपनों की...
पापा के हाथ से लिखी है वो पाती प्रेम भरी
जिसका इंतज़ार रहता था मुझे हर घड़ी..
कुछ चिठ्ठी ऐसी भी मिल जायेगी वहाँ
जो दादा और नाना के बीच के कविता रुपी संवाद है
अपनी नाती को नाना के घर बुलाने की मनुहार है
और दादा जी द्वारा लिखित में किया गया स्वीकार है..
एक चिठ्ठी की खुशबू बता रही इसमें रेसीपी ऑफ अचार है
दूजी चिठ्ठी में लिखें हैं कैसे पूजे जाते घर में त्यौहार है..
चल कलम आज फिर लिखते हैं और मिटाते हैं दुरियाँ
एक बार फिर से पहुंचाते है घर में प्यार भरी चिठ्ठीयां..
शायद पाकर ये ज़ज़्बात का दरिया धुल जाये गमगीनियां
और पा जाये अपना अस्तित्व जो खो चुकीं है चिठ्ठीयां..! 🍁
By Priyanka Mathur

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