चिट्टी
By jeeshant mathur
धड़कता रहा हलक में फिर सीने में आ गिरा,
टुकड़े कई हुए थे दिल के तन्हाई के शोर से,
कैसे कहें कि आशियान तेरा हमने राख किया,
मिट्टी डालते काप रहे, हाथ पड़ रहे कमज़ोर से
वोह वक्त जो शाम का कहकर गया था मुझको,
आज तक लौटा ही नहीं है उस भोर से,
मैं कब तक कीच लूंगा तू भी कब तक उलझेगी,
छुटकारा कैसे पाएं अब इस बेमतलब कि डोर से,
कल ही मां कह रहीं थी मेरे नाम का रिश्ता आया हैं,
सोचा तुझे बता दू कहीं तुझे पता लगे किसी ओर से,
सालगिरह इश्क कि हैं तो क्यूं ना हर साल जैसी हो,
तेरा हाथ थाम के खड़ा रहुं बारिश होती रहें बस ज़ोर से
यह मेरी कहानी है और मुझे एक चिठ्ठी कि तलाश है
तेरी मज़ार पर बैठकर लिखीं थीं खुदको तेरी ओर से
By jeeshant mathur

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