चाहतों में गर्द है
By Dhruv Pandey
सर्द मौसम, उसमें उसके गर्म हाथ।
बेचैन नैन देखे उसकी बाट।
सुलझे समय में उलझे रिश्ते।
कुछ हसीन तो कुछ बेढंगे किस्से।
वो कौन था?
वो क्या था?
मेरा सपना?
या कोई अंजान अपना?
बिन बोले ही हाथ पकड़के सड़क पार करवाना,
झुककर मेरे फीते बाधना।
हमेशा एक सीट बचाना,
या ठीक आधी रात को मेरा जन्मदिन मनाना।
वो सदा था वही जहा कभी नही था कोई।
उसके बिखरे बाल,
मेरे बिखरे जज़्बात।
खुरदुरी आवाज़,
उसके लयमय ठहाके।
कोकिला के स्वर भी क्या!
रंग भी सुहाना है।
उसका तो गुलाब भी दीवाना है।
वह न शिकारी है न ही शिकार।
वह इस दुनिया से परे है।
क्षितिज की लालिमा है।
वो कृष्ण की पुनीत गरिमा है।
उसकी जुल्फ़ें जब रुख से आ मिले,
शर्मा गए सब आईने।
जब उसकी नजर मुझपर फसे,
तो हम क्या, जल भी जल उठे।
वह कुदरत के कारीगरी का वरदान है।
उसने लड़ना शिखा है।
उसने अंगारों पर चलना शिखा है।
उसने तलवार का हर घात सहना शिखा है।
मेरे करीब आके विनम्रता से बोला,
"यह दुनिया इंद्र जैसों से भरी है,
तुम अहिल्या बनना मत।
यहा काफी नादान मछलियां है,
तुम जाल पिरोना मत।"
उसने मुझे रुकना सिखाया है।
समय से दो पल मांगके उसमें जीना सिखाया है।
उसने मुझे नीद को रात के साथ आंख मिचौली खेलते दिखाया है।
मुझे लगा था सबसे अलग है वह।
पर तुमने सुना है मानवरोग "मोह"?
आया ही नही कभी।
मुझे लगा कुछ देर रुकेगा जब छोड़ेंगे सभी।
वो तो खुदगर्ज निकला।
सबसे पहले समय सा वही फिसला।
किताब के पन्ने अब धूल बने।
अंत का पता नही पर सुखद अंत मिथ्य निकले।
इनके बीच कुछ सिखा मैंने।
वात्सल्य की इमारत साढ़ते फिर गिरते देखा मैंने।
By Dhruv Pandey

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