चारदीवारी से आकाश तक
- Hashtag Kalakar
- Dec 1, 2025
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By Mitul Chauhan
चारदीवारी में बंद पड़ा,
मैं चलूँ तो उस राह चला,
जहाँ दुनियादारी का खेल सजा,
मैं वहाँ बेबस-सा खड़ा ।
सब एक समान यहाँ,
ना कोई प्रथम, ना अंतिम यहाँ,
सब बेबस से पड़े हैं,
बीच चारदीवारी खड़े हैं ।
बस्ते में बाँध कर निडरता,
मैंने किया विद्रोह, चला अपनी राह,
खुद को खोजने की थी चाह,
ना कोई रोक सकता मुझे अब,
पहाड़-सी है ये दृढ़ता ।
प्रकृति से एक होने आया हूँ,
संग बस्ता भर के साहस भी लाया हूँ,
ना रोक सकता ये पहाड़, ना बर्फ, ना तेज़ हवा मुझे,
मैं आज आकाश को छूने आया हूँ ।
बर्फ पर पड़ते अपने कदमों का संगीत सुन,
साँसों ने भी बनाई अपनी नई धुन,
शांत हुआ मन, जल उठी बेबसता,
प्रकृति का है ये सबसे बड़ा गुण ।
आकाश से एक होकर, खुद को सबसे दूर पाकर,
आज़ाद होकर बेबस मन, दुश्चक्र जीवन और लाज से,
अपनी साँसों से मेरी दोस्ती हो गई आज से ।
By Mitul Chauhan

Talent toh hai Bhaiya aap mein
Inspiring yaar wow
Very good brother
beautiful one