चार दीवारे
By Bhumika Haritwal
अरे, कोई तो रोको इन चार दीवारों को,
यह मेरी ओर बढ़ रही है --
धीरे, पर निश्चित गति से।
हर ईंट जैसे नफ़रत में डूबी हो,
हर कोना मेरा नाम पुकारता,
और मैं--
भय से सिकुड़ती जा रही हूँ।
एक क्षण को लगा,
मैं इन दीवारों में विलीन हो जाँऊगी।
पर भीतर कहीं,
एक साहस की लौ काँप उठी --
और मैं भाग निकली।
अब मैं दर्पण के सामने खड़ी हूँ।
होंठो पर हँसी है,
पर दर्पण में चेहरा व्याकुल।
मैं ठिठक गयी --
कौन हूँ मैं ?
वह, या मेरा प्रतिबिंब ?
दिन बीतते गए।
प्रतिबिंब ने भी मुस्कुराना सीख लिया।
और उन चार दीवारों से
जो रोज मुझे डराती थी,
आज मैंने बात की--
धीरे, स्नेह से।
वे अब भी वही हैं,
पर आज
वे मुझे घेरती नहीं,
संभालती हैं।
By Bhumika Haritwal

Very good writing well done keep it up.
Very fantastic poem and completely relatable to real life.
Very beautiful writing very good use of metaphors.