चाय का बहाना
Updated: Aug 6, 2025
By Mukta Sharma Tripathi
वही एक कप चाय का बहाना।
चाहती बस तुझ संग बतियाना।
आज तो अंतर्मन खोल दूंगी।
चाहूं इलायची-सा इतराना।
गहरे रंग के मेघ बिखेरते,
चीनी मिला, मेरा मुस्कुराना।
रंग दूं बस अपने ही रंग में,
सोचते पल-पल युग-सा बिताना।
इस आँच में दिल, अभी पिघलेगा,
कप बढ़ा, कोमल स्पर्श चाहना।
धुआं धुंध में जरा-सा बहक कर,
मेरा जरा, सट कर बैठ जाना।
इधर चाय की पहली ही चुस्की,
और उधर कप खाली कर जाना।
बहके दिल के अरमान संभाल,
क्षुब्ध मेरा खाली कप उठाना।
By Mukta Sharma Tripathi

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