चादर की कदर
By Amit Sharwa
नंगा बदन था हमारा,
रोम रोम ठिठुरता।
अंग अंग पसीने में तर,
पंछी ये मजबूर था।
मशालें सारी बुझ गई,
सारी चमक अंधेरे में रम।
पलके झपकने को थी पर,
कुछ आंखों में नूर था।
देख बर्बादी का मंजर,
भड़का सोला एक अंदर।
खाक वो या राख हम,
कुछ तो होना जरूर था।
लगा एड़ी चोटी का दम,
वो तोड़ बैठे अपना दम।
खोल मुट्ठी छीनी आजादी,
सब पर चढ़ा सुरूर था।
दसों दिशाओं में उल्लास,
जैसे मथुरा में हो रास।
लेकिन खुदको माने मालिक,
फितरत का मजदूर था।
नंगे को चादर मिली थी,
पहरन को कापड मिला।
हाय! बुद्धि थी ही बंद,
तो मुमकिन होना चूर था।
देखो आज का नजारा,
बाजूओ का दम जो सारा,
जाया करते फोन पे,
मशगूल अपने जोन में।
खुदकी चादर की कदर ना,
दुसरो का कंबल चाहते।
फुटी कौड़ी जैसे खुद,
गुलाबी नोट है भाते।
नाकारी और बेइमानी से,
मिल सकती है मुक्ति क्या?
कुछ बेगुनाह बेकसुर की,
आग पेट की भुजती क्या?
एक निवाले को तरसते,
उपर बैठा कुछ तो दे।
सारे हक कुचले जाते,
घर,रबर,कुछ ना दे।
अपनी बुद्धि के ताले को,
बन्द करके चाबी फेंकी।
और फ़रेबी ग्यानिओ के,
फ़रेब करते देखा देखी।
यह कैसी निर्भरता है,
इंसान इंसान से डरता है,
बुलंदियों की नीव खोखली,
बेमतलब मशहूर था।
चादर की कदर जो होती,
हाल ना होता ऐसा आज।
साए में छुपके रहते हैं,
किस बात का गुरूर था?
मुक्त होकर भी है बंद,
बदला केवल पिंजरा है।
चादर होकर भी है नग्न,
जाने किसका कसूर था।
यह हम सबका कुसूर था।
यह पीढ़ियों का कुसूर था।
By Amit Sharwa

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