चरित्र
By Rashmi Abhay
जब खुद से हीं हारने लगे थे तुम तो सबसे पहला प्रहार किया था 'मेरे चरित्र' पर यूँ जैसे मेरा चरित्र कोई स्टैम्प पेपर हो जो तुम्हारे... वेरिफिकेशन सिग्नेचर की मोहताज है...
मुझे कोई ताज्जुब नहीं हुआ था तुम्हारे अपमानजनक शब्दों से क्योंकि तुम इस धरती के पहले पुरुष नहीं थे जिसने किसी स्त्री को लांक्षित किया हो बल्कि तुम वो कमजोर इंसान थे जो खुद को सही साबित करना चाहता है मगर कर नहीं पाता और जब खुद में जीतने की हर कोशिश में नाकाम हो जाता है तो शुरू करता है अपने हीं घर में एक चक्रव्यूह... एक ऐसा चक्रव्यूह जिसे बेंधने का तरीका खुद उसे भी नहीं मालूम लेकिन तुम्हारा पुरुषत्व इसे स्वीकार नहीं करता अजीब विडंबना है ना ये ज़िन्दगी की... पुरुष का अहम... हर छोटी बात से चोट खाता है, एक बात बताना.. इतना कमजोर क्यूँ है ये तथाकथित अहम...
By Rashmi Abhay

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