चप्पल
By Sushant Saurabh
शायद पता होगा आपको
जब आपकी चप्पल की एक डोरी टूट जाती है,
आप उसे घसीटते हुए,
किसी तरह
पीछे छूट जाने के डर से
अपने पांव को कभी आगे, कभी पीछे
दाएं, बाएं करते हुए
किसी तरह आगे बढ़ने की कोशिश करते हैं
आपकी एड़ी कभी उस कंकर को चुभ जाती है,
आपकी अधनंगी पांव धूल में मिल जाती।
और कभी तो चप्पल सरक ही जाती है।
आप रुकते हैं,
झुकते हैं,
किसी की सहारा लेकर
अपनी उंगलियों से चप्पल को फसाते हैं।
और फिर चलना जारी रखते हैं
इसी उम्मीद में की बस अब थोड़ी दूर और
क्योंकि लगता है
जो सामने है, भले ही दिख न रहा हो
वो जमीन थोड़ी समतल होगी
पिछला पांव से तो खून के कुछ बूंदे ने
मिट्टी को एक विचित्र सा रंग में बदल दिया
मानो सवेरे के उस लालिमा को
किसी ने मटमैले कपड़े में लपेट दिया हो
देखते है आगे क्या होता है
चप्पल नया तो नहीं ले सकता,
सिलने की पीड़ा को
वो शायद बर्दास्त न कर पाए,
वैसे मैं एक पांव के भरोसे भी चल सकता हूं
बस किसी का कंधा मिल जाए
या एक लाठी ।
By Sushant Saurabh

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