चक्री
By Kavita Chavda
रेखा बचपन से ही सीधी और बुद्धिमान लड़की थी। उससे टेढ़ा नहीं चला जाता था। इस वजह से कई लोग उसकी अच्छाई का फायदा उठाते। वो मन ही मन ये बात जानती भी थी पर अपने उसूलों पर अड़ग रहती। उसे अपनी मां से बोहोत लगाव था। उसकी हर बात में अपनी मां की सिखाई बातो का ज़िक्र हमेशा रहता। एक होनहार बच्चे के सारे गुण थे उसमें जैसे पढ़ाई में अव्वल, लोगों से दोस्ती करने में माहिर, बड़ो की इज्जत करना और अपना फर्ज़ खूबसूरती से निभाना। वो अपने आप में एक सरल इंसान थी पर उसकी जिंदगी उतनी ही उलझी हुई। उसे समझ नहीं आता था की क्यों वो बचपन से लोमड़ी जैसे लोगों का शिकार बनती रही। उसे समझ नहीं आता था की क्यों उसके सही होने के बावजूद उसके भाई की गलतियों का बोझ उसे उठाना पड़ता।
उसे समझ नहीं आता था की उसके नौकरी करने पर इतनी उंगलियां क्यों उठती रही। ज़माने की रीत के हिसाब से उसने शादी तो की पर उसे शादी भी समझ नहीं आई। पर शादी के बाद वो बदल गई। बचपन से सीधी रेखा को अब टेढ़ापन जचने लगा था। जिस नाइंसाफी का शिकार वो खुद होती रही उसका गुस्सा बिना सोचे समझे अब हर किसी पर निकालने लगी थी। उसकी एक बेटी हुई जिसे वो प्यार से चक्री बुलाती। वो उसे अपने अनुभवों से मिली सीख बताती और उसकी हर गलती पर उसे खबरदार करती। लोगों की नज़र में रेखा गलत थी, सिर्फ इंसान के तौर पर नहीं मां होने के हिसाब से भी। पर मन ही मन सिर्फ वहीं जानती थी की जीवन को रेखा की तरह जीने में सिर्फ हानि है। वो जान चुकी थी की जीवन असल में रेखा नहीं, एक चक्री है।
By Kavita Chavda

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