घूंघट
By Neha Srivastava
एक स्त्री का घूंघट
महज़
एक घूंघट नहीं है,
न ही है,
आवरण मर्यादा का
ढंकता है यह घूंघट
अपने भीतर
फूल सा नाज़ुक एक चेहरा,
उस चेहरे की हंसी
उस चेहरे का ग़म,
उस चेहरे की शर्म,
उस चेहरे की शिकन,
थोड़ा सा रिसता लहू,
कुछ निशान,
और
गहरे से ज़ख्म,
घूंघट नहीं
पर्दा है यह,
ढंक लेता है
जो,
एक स्त्री की विवशता
और
समाज की कुरुपता”
By Neha Srivastava

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