घर से निकलते ही
By Akshay Sharma
1. दिस्मबर की ठण्ड में अगर आपने अम्बाला स्टेशन से ट्रेन पकड़ी है तो आप समझ पाएंगे की वैसी, सूई जैसे चुभती ठण्ड आदमी की हालत ख़राब कर सकती है और वो भी तब, जब आप पहले से ही एक लम्बा सफ़र तय करके आएँ हों। धर्मशाला से अम्बाला कैंट की दूरी लगभग तीन घंटे की है लेकिन हिमाचल रोडवेज़ की जो बस पकड़ के मैं आया, उसके ड्राइवर ने धुंध और कोहरे को अनदेखा कर बस को सवा दो घंटे में ही बस अड्डे पे ला खड़ा किया। किसी और दिन ऐसा होता तो मैं स्पीड ड्राइविंग का बढ़ा मज़ा लेता, पर आज घर से निकलते हुए मैंने जल्दबाज़ी में वो जूते पहने जिसके बाएँ तलवे में छेद था। पूरे रास्ते मैं कपकपाता रहा और माँ की बात याद आती रही की ठण्ड पैरों से चढ़ती है। जब ठण्ड असहनीय हो गयी तो मैंने प्लास्टिक की पन्नी का गोला बनाया और जूते के अंदर से उसे छेद में फसा दिया।
चंडीगढ़ के ट्रिब्यून चौक पे जब बस रुकी तो मैंने हल्का सा खिसक के, एक मैली दीवार के पीछे सिगरेट जला ली। मुझे इतनी ठण्ड लग रही थी की सिगरेट का बड मेरी उँगलियों की बीच टिक नहीं रहा था, तभी अचानक पीछे से एक अधेड़ उम्र का आदमी आया और रूखी भारी कर्कश आवाज़ मैं बोला ''आपको जाडा लग गया है भाई, आप बीच बैठो"। इससे पहले मैं उनसे पूछ पाता की 'बीच बैठो' का मतलब, बस के बीच मैं बैठो ही है या कुछ और, तबतक ड्राइवर हॉर्न बजाके सभी सवारियों को वापस बुलाने लगा। शाम का वक़्त था और आमूमन लोग बड़ी उम्र के थे तो ठीक-ठीक पता नहीं लग पाया कौन था। जब बस चलने को हुई तो मैंने देखा एक आदमी, शायद वही कर्कश आवाज़ वाला, बहार खड़ा अपने दोनों हाथ उठाके मुझे अलविदा कर रहा था। ठण्ड से मेरा दिमाग़ सुन था तो मैं भी हथेलियाँ उठाके उसे 'टाटा' करने लगे।
2. बस अड्डे और सिटी रेलवे स्टेशन के बीच की दूरी ज़्यादा नहीं, पैदल चलें तो दस मिनट और शेयर ऑटो पकड़ें तो पांच। पिछले डेढ सालों से आता रहा हूँ तो थोड़ा अंदाजा हो गया है आस पास का। वैसे ये पुणे की ट्रेन चंडीगढ़ से भी रिज़र्व कराई जा सकती थी पर उसका रूट काफ़ी लम्बा है, अम्बाला से रवाना होने वाली ट्रेन के मुक़ाबले करीब चार घण्टे ज़्यादा। ये तो रहा टेक्निकल ट्रूथ पर असल बात है भगत के परांठे और चाय। बहुत एक्साइटमेन्ट होती है ये सोच के ही कि जब घर से कॉलेज जाऊँगा तो वहाँ परांठे खाके और आधी सिगरेट पिके साइड बिरथ पे लेट जाऊँगा। 'भगत परांठे, आलू प्याज़ स्पेशलिटी', महेंद्र जी का खाना मेरे सफ़र के हाज़मे के लिए ठीक बैठता है, इसका कारण है कि ये परांठों में मैदा नहीं डालते। मैदे से मेरी लड़ाई बी.टेक के फर्स्ट ईयर में ही शुरू हो गयी थी। जितनी इंजीनियरिंग ड्रॉइंग्स मैंने बनाई नहीं थीं उससे कहीं ज़्यादा उसके स्ट्रेस में मैंने मैग्गी २ मिनट खाए होंगे। अब पांचवे सेमेस्टर में आके हाल ऐसा है कि वो पदार्थ बिल्कुल पचता नहीं, दोनों ही!।
आलू सही उबले हुए, प्याज़ के टुकड़े पहाड़नुमा नहीं और खट्टा मीठा अमचूर का स्वाद, पर मेरे ख़्याल में इनके परांठों से ज़्यादा फ़ेमस है इनकी चाय - न मीठी, न हल्की और हर वक़्त फ़्रेश। ज़्यादातर होटलों में सुबह की बनी चाय ही दिन भर परोसी जाती है। हल्की बास रहती ही रहती है उस चाय के टेस्ट में पर यहाँ चाय का टेस्ट हरदम ताज़ा, कड़क।
इसी एक रोमांच के साथ सफ़र की शुरुआत भी होती है बीते वक़्त में जितनी बार भी घर से कॉलेज आया हूँ यही सिलसिला रहा है - बर्थ पे बैठूंगा, 'मैन्स सर्च फ़ॉर अल्टीमेट फ़्रीडम' का आख़री पढ़ा पन्ना खोलूँगा (पिछले एक साल से कोशिश जारी है पढ़ने की), आँखें ख़ुद-ब-ख़ुद भारी होंगी और गहरा सो जाऊँगा। ख़ुदा-ना-ख़्वास्ता अगर अव्वल दर्जे का मन न लगा तो उसके लिए स्प्राइट की पेट बॉटल में वाइट रम भर के लाया हूँ (ये वो एक अच्छी चीज़ जो मेरे फ़ोर्थ ईयर सीनियर्स ने मुझे सिखाई)। रम की चुस्कियाँ और सिगरेट के कश लिये जाएँगे किसी अनजान, भूतिया स्टेशन पे जहाँ उतरते ही रौंटे जी उठते हैं।
3. मैं चाय की चुस्कियाँ खींच ही रहा था कि मुझे अपने स्कूल की एक सीनियर दिखी। मुझे वो याद थी क्योंकि मेरा बड़ा भाई उसका दीवाना था। उसके सौम्य चेहरे सा ज़्यादा उसकी शॉर्ट लेंथ स्कर्ट का। केवल वो ही नहीं पूरा स्कूल पागल था कृति के पीछे, उसी लेंथ के चक्कर में। बहुत दूर नहीं बैठी थी तो सोच जाके मिल लूँ, शायद ये भी पुणे जा रही हो। मुझे याद है, जब मैं और मेरा सबसे क़रीबी मित्र धीरज, सीनियर गर्ल्स को निहारा करते थे तो मैं कृति के चेहरे की तारीफ़ किया करता और धीरज केवल एक बात बोलता “शी इस वेल फ़ेड”।
इस वाक्यांश का सही मतलब समझने में मुझे थोड़ा वक़्त लगा पर उस दिन की तरह ही आज भी मेरी मंशा ग़लत नहीं थी और इस बात की स्पष्टता उससे मिलकर पूरी हो जाती तो मैं उससे मिलने आगे बढ़ा। थोड़ा आगे बढ़कर देखा तो वो नहीं थी, वहाँ कोई और ही खड़ा था। लाइट की शैडो इस तरह पड़ रही थी कि लगा कृति है। जिज्ञासु बन मैं उस अनजान लड़की के इतना क़रीब आ गया था कि जब मुड़ा तो अजीब सा फिसला, ऐसे की मुझे सँभालते सँभालते बायाँ जूता ही बहार निकल आया। मैं ज़मीन पे बैठा ख़ुद की दशा को समझ ही रहा था कि वो लड़की बोली "व्हॅट वर यू ट्राइंग टू डू", मैंने कहा " वो जूते में छेद था तो फिसल गया" और प्रमाण तो सामने था ही।
बेतुकी हरकत, भलता जवाब और स्पॉटलाइट मुझ पर । उठा तो देखा सब घूर रहे थे, प्यालों की 'सुरर...सररप' और सब की नज़रें मेरी तरफ़। अपने इस बिन मांगे अभिनय की ऊर्जा में मालूम ही नहीं चला कि तापमान छह से चार डिग्री गिर चुका था। तय की हुई एक सिगरेट जो किसी भूतिया स्टेशन पे जलने थी वो अभी जल गयी। बस अड्डे के पीछे शौचालय के पास कुछ ड्राइवर बीड़ी फूक रहे थे, तो वहाँ सुलगाना मुनासिब लगा। बीड़ी की महक ज़रा स्ट्रॉन्ग होती है पर पेशाब की गन्ध से ज़्यादा नहीं, पीते पीते थोड़ा दूर निकलना पड़ा ताकि सारा ध्यान गन्ध पर न जाए।
एकांत मे कश भरते हुए कृति वाली हरकत पे लज्जा आने लगी। ठण्ड ऐसे भी क्या दिमाग़ पे चढ़ी कि इंसान न पहचान में आया!। गुज़रे सभी भावों का असर, जब से सफ़र शुरू किया था, तम्बाकू के रसायन से मिलकर मेरे पेट में हलचल पैदा करने लगा। शौचालय साथ ही में था और निःशुल्क, फिर भी अंदर ना घुसने का निश्चय अटल रहा क्योंकि मेरा एक अनुभव मुझे कठिन स्तिथि में भी अंदर न जाने का साहस प्रदान करता है। वो अनुभव मुझे ऐसे ही एक शौचालय से मिला था जहाँ कोने में मैंने ढेर सारी सूइयाँ पड़ी देखीं थी। खैनी, बीड़ी आम बात है पर इंजेक्शन देख कर मैं देहल गया था। बस अड्डे से स्टेशन के बीच की दूरी अगर भाग के तय की जाए तो पांच मिनट में पूरी हो सकती थी, तो वही किया।
जब मैंने दौड़ लगाई तो ऐ.सी वेटिंग रूम का दरवाज़ा मेरी आँखों के सामने था और ठीक सात मिनट बाद मैं वेटिंग रूम के टॉयलेट में।
4. जिस हल्केपन के साथ मैं साइड बर्थ पर लेटा उसे बयान नहीं कर सकता। भूरी रजाई बस! ओढ़ली, सामने का पर्दा लगाया और बल्ब का फाटक खोल लिया। ऐसे भी सोया जा सकता था पर कुछ पढ़ के आयी नींद ज़रा गहरी होती है। मुझे यक़ीन था कि पहले दो अनुच्छेद पढ़ आँखें आपने आप बंद हो जाएँगी, ऐसा होता आया है और होगा। नसीब अच्छा था कि घुसते ही टी.टी ने टिकट चेक कर ली, अब आधी नींद से भी उठना नहीं पड़ेगा। लेकिन एक गहरी नींद का सपना अधूरा रह गया जब बाजू वाली बर्थ पे विराजमान एक न्यू बॉर्न चिंघाड़े मारकर रोने लगा। एक सहनिय रोना होता है और एक असहनिय चीख़!..नवजात बच्चे उसमें माहिर हो सकते हैं और इसका प्रूफ़ ख़ुद उनके माता पिता देंगे। चिंघाडे इतने बलशाली थे कि मेरी रीड की हड्डी अपने आप उठ पड़ी। बड़े धैर्य के साथ मैंने इंतज़ार किया - दस, पंद्रह, बीस मिन्ट पर जब लगा भाई रुकनेवाले नहीं हैं तो अपनी तरफ़ से मैंने डिस्टर्ब होने की आवाज़ें निकलना शुरू करीं "टससस ...तच्चचच्च " ताकि उसके माँ बाप उसे टहला लाएँ। पर वो शांत कैसे हो सकता था क्योंकि अभी तो असली सिम्फ़नी की शुरुआत होनी थी।
मेरे ऊपर वाली बर्थ पे लेटी सवारी एक अजीब से आवाज़ में ख़राटे मारने लगी। वो ख़राटे न तेज़ थे, न मलीन पर कुछ विचित्र सा पैनापन था उनमे जैसे कबाड़ी वाले की आवाज़ में होता है - तीखापन। वो दोनों आवाज़ें साथ में किसी की भी नसें ऐंठ सकती थीं। जब इतना काफ़ी नहीं था तो किसी सवारी ने अपने ख़ूब चले जूते उतारे। मोज़े की गन्ध ऐसी थी कि अच्छे अच्छों के पाप धुल जाते। उस शख़्स को जब एहसास हुआ तो उसने अपनी तरफ़ से गन्ध को मिटाना चाहा एक फ्लोरल सेंट छिड़क के जिसने बदबू को दबाया नहीं बल्कि गन्ध का रुख ही बदल दिया। अकेली गन्ध सहन हो सकती थी पर ये सस्ते प्लास्टिक फूलों की दुर्गन्ध दम घोट रही थी। और फिर आगमन हुआ एक ऐसे वाद्ययंत्र का जिसका सभा में शामिल होना किसी को भी अचंभित न करता - प्रवेश द्वार की 'चुर चुर', अति तार सुर में कभी न रुकने वाली लय।
कभी बच्चा धीमा पढ़ता तो कभी ख़राटे तेज़, कभी ख़राटे निचले सुर में तो कभी दरवाज़े की चुर चुर पैनी। इनका ताल माल जैसा भी रहा हो पर फूलों का गुलदस्ता, मोज़े से लैस हर क्षण आपके समक्ष। थोड़ा पर्दा खोल जब अलौकिक सिम्फ़ोनी की तरफ झाँका तो सामने लेटी एक मध्य उम्र की महिला का आँचल उभरा पड़ा था। किसी और दिन नज़र घुमा लेता पर आज मैंने अपनी नज़रें वहीं टिकाए रखीं। मैं उन्हें देखता रहा जब तक मेरी आँखें नींद से बन्द न हो गयीं।
5. सुबह मुँह धोते, उस लेडी से फिर मुलाक़ात हुई। वो हिलती डुलती टॉयलेट की तरफ़ बढ़ी तो मैंने कहा "आप इंडियन यूज़ कर लीजिए, वेस्टर्न वाला काफ़ी गन्दा है", उन्होंने कहा "थैंक यू", तो मैंने भी कहा "...थैंक यू"। बोगी के अंदर घुसा तो देखा नवजात बच्चे के पिता उसको गोद में लिए मेरी बर्थ की आधी सीट पर बैठे थे। उनके एक हाथ में बच्चा था और एक हाथ में फ़ोन, वो फ़ोन में गेम खेलते काफ़ी देर तक वहीं बैठे रहे। नाश्ते की पुकार सुन वो तुरंत उठे और उनके उठते ही ऊपर वाली सवारी वहाँ आ बैठी। उन तीनों के चेहरों में एक समानता थी कि तीनों के नाक टेढ़े थे और भौएँ पतली, जैसे थ्रैडिंग करवाई हो।
ब्रेकफ़ास्ट की ट्रे आते ही मेरा सारा अवलोकन और लोगों की विचित्रता थम सी गई। ट्रेन के ब्रैड कटलेट का मैं दीवाना हूँ और बड़ी उत्सुकता से उसे तैयार करके खाता हूँ। मैं भींचे कटलेट को ब्रैड के बीच रख ही रहा था कि मैंने देखा, ऊपर वाले बर्थ से वही कृति आकृति वाली लड़की उतरी। वो औरत जिन्हे देख मैं सो पाया था उन्होंने उस लड़की को ब्रेकफ़ास्ट की ट्रे पकड़ाई। वो लड़की आलती पालती मारकर औरत के बग़ल में बैठ गई और अपना नाश्ता खाने लगी। कुछ देर बाद उसने उन्ही के काले बैग से 'अज्ञेय' की एक किताब निकाली और हथेली के निचले भाग से पन्ने पलटने लगी।
6. "बहुत उलझा सकता है अज्ञेय आपको" ऐसा दादाजी कहा करते थे। क्योंकि वो अज्ञेय के लिखे गद्य बार-बार दौहराते तो कुछ मुझे भी याद थे, सोचा कल रात हुए मेरा उस दुर्व्यवहार की माफ़ी अज्ञेय की चर्चा करके ही माँग लूँ। कोडिंग कर कर के मुझे लॉजिक फार्मेशन कुछ आसान लगने लगा था इसलिए पहली इंट्रोडक्टरी लाइन फ़टाफ़ट सोच ली "अज्ञेय मेरे दादु पढ़ा करते थे, काफ़ी गंभीर और जटिल है इनकी लिखाई....दादु कहते थे, जैसे शकेस्पेयर डरा सकता है वैसे ये भी डरा सकते हैं" और इसके बाद कोई गद्य सुना दूँगा ताकि कोई गुंजाइश ही ना रहे कि मैं छिछोरा नहीं। मैं अपनी शरीफ़-तब'अ जतलाने की शुरआत करनी ही वाला था कि उसने मेरी तरफ़ देख कर अपनी माँ से कहा "मॉम ही वॉस द वन !"। उस औरत ने मेरी तरफ़ देखा, उन्हें सुबह टॉयलेट के बहार वाला क़िस्सा याद भी आया पर फिर भी वो बोलीं ''बतमीज़"। उनके ज़ज़ज़...ध्वनि से बच्चा फिर रो पड़ा और उसकी चीख से वो फ्लोरल सेंट की गंध मेरे नाक में आ बैठी।
मैंने खुद को उस घटना से अलग थलग करने के लिए बैग से किताब निकाली और पढ़ने का नाटक करने लगा। कुछ सेकंड बाद, मैंने सिर शीशे की तरफ़घुमाया तो देखा ट्रेन मध्य प्रदेश के ग्रामीण इलाकों से गुज़र रही थी एक धीमी रफ़्तार में। वहाँ गेहूँ के खेत में खड़ा एक पक्के रंग का पुरुष, मेरी तरफ़ देख, अपने दोनों हाथ हिला रहा था।
By Akshay Sharma

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