घर घर में दुर्गा
Updated: Oct 8, 2022
By Jyoti Saraf
ओ माझी ओरे माझी! क्या तूने सुनी पावन पुकार रे,
माँ दुर्गा तुझे बुला रहीं, ले आ उनको इस पार रे।
कल रात पुकारा था माँ को, सुन ली उसने मेरी गुहार रे,
पापों का घड़ा कुछ अधिक बढ़ चला, आकर उसे संभाल रे।
कहीं हो रही लूट- पाट, तो कहीं हो रहे दंगे फ़साद रे,
कोई किसीको ज़हर दे रहा, गला कट रहा हर बार रे।
कोई दुखियारी कहीं मर रही, जग में फैला अंधकार रे,
फैल रहा अत्याचार, भ्रष्टाचार, नर संहार और नारी पर वार रे।
बस कैसे भी आजा मेरी अम्बे, नौका, हाथी या घोड़े पर सवार रे,
उतर जा माँ हर आंगन में, सुन ले सबकी दर्द भरी मनुहार रे।
हर क्षण हम तुम्हें याद कर रहे, आ गया दुर्गा पूजा का त्यौहार रे,
सुनते हैं हम आगे बढ़ रहे, पीछे छूट रहा आपस का प्यार रे।
असंख्य मंदिरों में भेंट चढ़ाते, क्या धुल जायेंगे सब पाप रे,
कहते हैं दुनिया छोटी हो गई, पर तुच्छ हो रहे सबके संस्कार रे।
हर दिन नये हम शस्त्र बनाते, फिर करते अपनों पर वार रे,
भूल रहे दया करुणा का पाठ, रह गया केवल माया जाल रे।
घर घर में छाया महिषासुर का आतंक, सब कर रहे तेरा इंतज़ार रे,
दश भुजा धारिणी, मंगल करणी, हे भवानी! कर दे पशुता का नाश रे।
जब जब तू धरती पर आती, मिलकर हम सब करते शंख नाद रे,
पुष्प चढ़ाते, भोग लगाते, थाल बजाते, करते तेरा सम्मान रे।
भूल रहे अपनी परंपरा, पर इतिहास याद दिलाता हर बार रे,
माँ सरस्वती हो या माँ काली, हो माँ लक्ष्मी या माँ गौरी रे।
हो जोधाबाई या लक्ष्मीबाई, हर युग नें की उनकी जयकार रे,
नारी! हो तुम रूप शक्ति का, भर लो अंतर्मन में स्वाभिमान रे।
By Jyoti Saraf

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