घर घर की कहानी
By Vyshnavi Kanugula
एक है पैसा खाने को तैयार,
दूजा कोसने का कर रहा है इंतजार।
एक ढूँढ रहा है हमारी खामियां,
दूजा उड़ा रहा है हमारा मजाक।
लगेंगे दुश्मन, पर है हमारे रिश्तेदार।।
आज पढ़ गए सोच में की,,
रिश्तेदारों की मैं सोचूं क्यों?
जब है कोई, जो हमें समझने को हैं तैयार,
जो जीवनभर कर सकते हैं हमारा इंतजार,
जो लगेंगे फरिश्ते, पर है हमारा परिवार।
जो हो जाए वक्त मुश्किल, ये रहेंगे वफादार,
जो साथ छोड़ जाए हालत, ये करेंगे उस पल को आसान।
फिर लगा, सोच किस बात की? चिंता किस बात का?
जो मिलवाया ऐसे परिवार से हमें, उस भगवान का हमेशा रहो शुक्रगुजार।
By Vyshnavi Kanugula

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