घरौंदा
By Vandana Pathak
देखी चार दीवार, वो छत हर जगह,
देखा वो बिस्तर, वो अपना सा कोना हर जगह ।
देखी शाख़ों से छन के आती धूप,
और दरख़्तों की छाया हर जगह ।
वो फूलों से महकता आँगन देखा,
वो भीनी भीनी मिट्टी की ख़ुशबू हर जगह।
जहां सासें चली, कदम रूके,
हर उस मुक़ाम को घर बना लिया ।
थोड़ा थोड़ा दिल हर मुक़ाम पर दिया,
थोड़ा थोड़ा घर बना लिया ।
By Vandana Pathak

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