गोधूलि
By Monica Banerjee
अक्तूबर की यह दोपहर
शायद शरद से ही कुछ खनक मांग लायी होगी
तभी तो बैठे बिठाए आँख लग गयी
जागते हुए जो कल्पना मात्र हो
वो सपनों में साकार कर लायी
क्या देखती हूँ!
पलाश के पेड़ से छनकर आ रही
जाते हुए सूरज की मध्यम धूप,
क्षितिज पे गोधूलि भी दस्तक देती ही होगी!
फिर तो वक़्त हो चला!
बाहर हरी दूब पर बिखरी कुछ बेंत की कुर्सियाँ
एक उज्जवल मेज़पोश, कुछ फूल,
चित्रकारी से सजे दो चाय के प्याले
और उनपर झुकी हुयी सी अरे मैं!
ज़्यादा नहीं बस बीस एक साल और जुड़ गए हैं व्यक्तित्व से!
दूर यह कौन है पगडंडी पर
जो मेरी ही तरफ़ बढ़ा चला आ रहा है?
अरे ठहरो! इन सधे हुए कदमों को तो मैं एक अरसे से पहचानती हूँ!
अब पास जो आए तो यह सहज हंसी ही मेरा ख़ज़ाना है!
यह एक निश्छल हंसी ही तो बरसों की उम्मीद है!
ख़ैर! अब चाय की चुस्कियों पे
आँगन में मिलते हुए दस बरस हो गए
ये शामें, सब की सब शामें
इनका अर्थ ढूँढना सहज नहीं, तो मुश्किल भी नहीं!
अपने आंगतुक के लिए
चाय की तैयारी, इन शामों का
सबसे अहम हिस्सा है!
क्यों ना हो? आंगतुक लेखक साहब
कुछ यूँ ही व्यस्त जो हैं! उम्र के इस पड़ाव पर भी ऊँचाई के शिखर पर जो ठहरे!
और यही इन शामों की जीत है!
यह शामें रिश्तों की मोहताज़ नहीं
अपेक्षाओं में बाधित नहीं
एक छत के नीचे रहने को विवश नहीं
किसी की सुनने की इन्हें परवाह नहीं!!
सुनो लेखक! कुछ सत्तर साल तो मैंने पार कर दिए
तुम्हारे सुख बाँटने का सौंदर्य
तब भी मेरे पास नहीं था, आज भी नहीं है
लेकिन तुम्हारे दुःख बाँटने का सौभाग्य मेरा हक़ है
सुंदरता का कोष नहीं मेरे पास
हाँ संगिनी की संवेदना अवश्य है!
कांति रूपी ऐश्वर्यI मैं नहीं
पर करुणा भरी प्राचुर्यI, हाँ खूब हूँ।
By Monica Banerjee

Comments