गेहूँ की बालियाँ
By Anant Srivastav
सुबह का समय
क्षितिज पर सूरज
लालिमा की चादर ओढ़े
धीरे-धीरे मुस्कुरा रहा था।
गाँव की हवाओं में
अब भी थी मिट्टी की सोंधी ख़ुशबू,
और जीवन का वह सहज प्रवाह—
जो हर सुबह को
विशेष बना दिया करता था।
घर की चहल-पहल
धीरे-धीरे जाग रही थी।
पिता जी झाड़ू थामे
धूल समेटने में रत थे,
माँ मटके से दही निकाल
छाछ मथने को तत्पर,
हर वस्तु अपने क्रम में,
जैसे सुबह अपने सुर में बहती हो।
उसी आँगन से,
निकला बच्चों का एक झुंड—
हँसी-ठिठोली करता,
नंगे पाँव...
भागता हुआ
पके गेहूँ के खेतों की ओर,
जहां बिखरी हुई गेहूँ की बालियाँ,
सूर्य की किरणों में उनकी चमक
मानो उन्हें पुकार रही हों।
वे बच्चे—
धूल में खेलते,
हवा से बातें करते,
मेड़ों पर झूमते
हथेली में बालियाँ मसल
या अग्नि में सेंक
छोटे-छोटे उत्सव मनाते।
अपनी कमाई से
बर्फ़ का इंतज़ाम करते,
कभी साझेदारी,
तो कभी प्रतिस्पर्धा—
कौन ज़्यादा बालियाँ बटोरेगा?
कौन पहले बर्फ वाला पकड़ेगा?
वो झोली में भरती बालियाँ
सिर्फ़ अनाज नहीं थीं—
वे थीं...
उनके रिश्तों की गर्माहट,
दोस्ती की मिठास,
अपने पहले श्रम का सम्मान
और मिट्टी से जुड़ाव का पहला पाठ
कभी साथ हँसी में लिपटी यादें
नम कर जाती हैं आज भी वो आँखें।
माँ की डाँट…
देर से लौटने की शिकायत,
दोस्ती में बाँट लेना बर्फ़ का स्वाद—
सब कुछ उसी खेत में,
उन्हीं बालियों के बीच
कहीं दफ़्न है अब।
आज भी खेतों में
लहलहाती हैं वही बालियाँ,
पर अब कोई बच्चा
नहीं दौड़ता उनकी ओर।
वे बालियाँ अब भी खड़ी हैं—
मौन, स्थिर,
जैसे समय से पूछती हों…
कहाँ गए वो दिन?
वो मासूम दौड़?
वो बर्फ़ का स्वाद,
और बचपन की वो कहानियाँ?
By Anant Srivastav

बहुत उम्दा सोच