गृह प्रवेश
- Hashtag Kalakar
- Jun 14, 2024
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Updated: Oct 5, 2024
By Sakshi Arya
"तुम पराया धन हो" बचपन से वो ये सुनती चली,
"ये ससुराल है तुम्हारा , तुम्हारे पिता का घर नही" ,
इन तानों से भी गुज़रती चली।
दूसरों के मान-सम्मान का ध्यान रखते-रखते,
वो न जाने कब अपने आत्म-सम्मान से समझौता करती चली।
कभी केहते- कभी सेहते ना जाने कब,
उसके सब्र और स्वाभिमान की डोर छूटती चली।
एक रोज़ जब सहनशीलता की हद पार हुई,
वह ये ठान बैठी,
अब स्वयं को प्राथमिकता देने की घड़ी आ चली ।
वो सपने जो पिता-के-घर से पति-के-घर के रास्ते में कहीं बिछड़ गए थे शायद ,
उन सपनों को फ़िर से साकार करने चली।
वो अपने अस्तित्व की तलाश में निकल चली,
वो अपने नाम से अपनी ख़ुद की पहचान बनाने चली ।
और अंततः वो मायके और ससुराल के दायरों को तोड़ती चली।
वो अब अपने स्वयं के गृह निर्माण की ईंट जोड़ती चली।
एक घर, जिसे गर्व से वो अपना केह रही थी,
उसी घर में आज वह "गृह प्रवेश" करने चली।
By Sakshi Arya

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