गुल्लक है या ज़िंदगी !!
Updated: Oct 8, 2022
By Jyoti Saraf
क्या कहूँ ज़िंदगी की दास्तान ऐ मेरे दोस्तों,
बस दास्तान ही तो है, ज़िंदगी कहाँ है दोस्तों।
दोस्ती की तो प्यार नहीं निभा पायी दोस्तों,
प्यार के उसूल निभाए तो दोस्त पीछे रह गए दोस्तों।
कभी कभी जब खयालों के भँवर में फंस सी जाती हूँ,
बस उलझ के बीते पलों में यूँ ही थम सी जाती हूँ।
सोचती हूँ तब, ज़िंदगी बढ़ती है कि मैं थम सी जाती हूँ।
अनमनी सी कोशिश करती तो हूँ पर खो सी जाती हूँ।
कही अनकही बातों के गुल्लक ज़रा भारी से हो गए हैं,
बजा के देखा था कल मैंने, बड़ी आवाज़ें कर रहे हैं।
बार बार कुछ किस्से बाहर आने की ज़िद कर रहे हैं,
ताले को और कस तो दिया, पर वो दस्तक दे रहे हैं।
मैं भी कम ज़िद्दी नहीं, कल रात गुल्लक कहीं छोड़ आई,
सुबह के उजालों नें मेरी आँखें खोल दी, लगा ये क्या कर आयी!
उस गुल्लक में मेरे कितने सपने थे, सब क्या मैं खो आयी,
उन सपनों में मेरे कितने अपने थे, सब क्या मैं भूल आयी।
बासी कपड़ों में ही उन पुरानी यादों को वापस लाने दौड़ पड़ी,
केले का छिलका रास्ते में गिरा था, नज़र ही नहीं पड़ी।
फिसल गयी मैं, ध्यान तो कहीं और था, ज़ोर से गिर पड़ी,
शर्माते सकुचाते उठी तो एक जाने पहचाने चेहरे पर नज़र पड़ी।
अरे! ये तो वही है जिसने मुझे गुल्लक लाकर दिया था,
ये तो वही है जिसने मुझे प्यार के रंगों में नहला सा दिया था।
अनगिनत सुर्ख फूलों से उसने मेरा दामन भर सा दिया था,
शामें मेरी खुशबुओं से महका के सवेरों को नहला सा दिया था।
ओह! जैसे ही उसे देखा मैंने, वैसे ही कदम थम से गए,
गुल्लक को क्या याद करें, हम तो साँसें लेना ही भूल गए।
साँसों की क्या औकात, जब अपनी धड़कनों से हम टकरा गए,
आँखों ने इतना पानी बरसाया कि जुदाई के सारे गम धुल गए।
By Jyoti Saraf

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