गुलाबी सर्दी
By Priyanka Mathur
नर्म मखमली घास पर ओस की बूँद हो जैसे
तुम्हारे ख़्यालों की दस्तक होने लगी है ऐसे...
फिर याद आने लगी है वो धूप कुनकुनाती
कोहरे की चादर ओढ़े खड़ी वो गुलाबी सर्दी...
जब हम तुम रूठकर बैठे थे पीठ मोड़े
एक-दूसरे का मगर हाथ कभी नहीं छोड़े...
और पहना रहे थे जामा अपने अपने जज़्बात को,
तुम्हारी गज़ल इतरा रही थी,
लफ्ज़ की मखमली पहरन में...
वहीं मेरी कविता ने श्रृंगार किया छन्द अलंकार से..
गुलाबी ठण्ड में हल्की सी धुंध में
ठिठुरन दे रही थी ताल हमारी मोहब्बत को...
दो दिल धड़कन के बढ़ जाने से पिघल रहे थे,
परन्तु तभी तुम्हें याद आगया अपना फ़र्ज..
और तुम चल दिये पहन कर खाकी वर्दी,
बिरहन बन बैठी अब तो ये गुलाबी सर्दी..!🍁
By Priyanka Mathur

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