गुमान-ए-इंसान
By NIDHI PALIWAL
खुद को इंसान कहते हो एक बेज़ुबान को मार कर शेर बस्ती में आकर शिकार करले तो दरिंदा कहते हो देखा है कभी आईने में झांककर!
तुम्हें तो आवाज़ बक्शी है दिमाग भी गुमान दे गया चलो देखते हैं ज़ुबान काटकर! स्वर्ग की बात करते हो पाप से तौबा है मंदिर, मस्ज़िद जाकर कुछ नहीं होता जहन्नुम के काम कर। अटक जाता होगा निवाला हलक में, भूख भी मिट जाती होगी तारीफ-ए-इंसान कर। गले तो तुम लगाओगे ही, छुरा पीठ पर घोंपने को; कहते तो वो भी इबादत हैं ईद-ए-बकरा हलाल कर।।
By NIDHI PALIWAL

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