गुम ख़ामोश कहीं ………..
Updated: Sep 21, 2022
By Vishal chaudhary
कल्प बदले युग बदले, और बदले जज़्बात
रहे पर मग्न ख़ुद में ही, चाहे बदले दिन-रात
गुनहगार आदमज़ाद पूरी, एक किसी का दोष नहीं
हम तब भी चुप थे और, रहेंगे अब भी गुम ख़ामोश कहीं !!
इंसानियत को बिकते देखे, आबरू के गिरते दाम को भी
सोमनाथ को लूटते देखा, और देखा टूटते राम को भी
ज़ुल्म-ओ-सितम सहते देखा, पर ना देखा आक्रोश कहीं
हम तब भी चुप थे और, रहेंगे अब भी गुम ख़ामोश कहीं !!
नंगी होती शमशीरों से, देखे नंगे होते फ़रेबी राज़ कई
और बीच चौराहों उजालों में, देखे उत्पन्न होते तमराज कई
रहे ताउम्र मशगूल कहाँ, कि रहे डूबे,और मदहोश कहीं
हम तब भी चुप थे और, रहेंगे अब भी गुम ख़ामोश कहीं !!
घाव भी गहरे हैं अब कि, दर्द-पीड़ भी शायद उतनी नही
नीलाम होती युगों से क्या, किसी की बहन-बेटी-पत्नी नही
ज़ालिम को आँख दिखाए, ना मिला ऐसा सरफ़रोश कहीं
हम तब भी चुप थे और, रहेंगे अब भी गुम ख़ामोश कहीं !!
कब तक तुम बचते फिरोगे, ऐसी इब्लीस की संतानों से
ख़ौफ़ की ज़द में हैं आवामें, ऐसे शैतानी सुल्तानों से
सच और फ़क़ीरी का पहने नक़ाब, ऐसे नक़ाबपोश यहीं
हम तब भी चुप थे और, रहेंगे अब भी गुम ख़ामोश कहीं !!
सदियों से, होते शोषित भावों से,सीखी ना हमने सीख़ कोई
और यूँ ना दमन होता हमन का, लेता ग़र जो चीख कोई
ज़िल्ल-ए-इलाही बने फिरते हैं, निर्लज्ज रूह-फ़रोश यहीं
हम तब भी चुप थे और, रहेंगे अब भी गुम ख़ामोश कहीं !!
By Vishal chaudhary

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