गुनाह और भी हैं
By Prakash Kumar Shukla
हर ख्वाब - दुआ - अर्ज़ी में तेरा ही नाम लेता है ,
जरूरतें और हैं उसकी , चाह और भी हैं।
हो गमसदा तो लिपट जाती है किसी दामन से ,
महज़ मैं नहीं उसका, उसपे पनाह और भी हैं।
मैं अकेला नहीं जो तेरे हुस्न का शिकार हुआ ,
मेरी ही तरह दुनिया में गुमराह और भी हैं।
मेरी चस्म-ए-नज़र ज़ब्त करके मुतमइन न होना ,
तेरी ज़ुम्बिश पे निगाह और भी हैं।
मेरी ख़ामोशी को अपनी ज़मानत न समझ ,
तेरी बेवफाई के गवाह और भी हैं।
करके रुस्वा भी मुझे क्यूँ तू शिकन नहीं करती ,
इल्म है मुझे , करने को तेरी परवाह और भी हैं।
मैं मर भी जाऊं तो तू बेवा नहीं होने वाली ,
रज़ामंद तुझसे करने को निकाह और भी हैं।
क्यूँ पैरवी तू सिर्फ इश्क़ कि करता है 'अलख' ,
और हैं मुज़रिम यहाँ , गुनाह और भी हैं।
By Prakash Kumar Shukla

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