गीता का सार- श्रीकृष्ण का उपहार
By Neetu Saxena
जब मनुष्य पर संदेह व निराशा है मंडराती,
आशा किरण क्षितिज पर वही है दिखाती,
मन मस्तिष्क को सुकून वह दे जाती,
श्री कृष्ण की गीता हमें सदैव सतमार्ग है बताती।
आरंभ हुआ जिसका कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में,
किया साक्षात जगत को जिसे, संजय ने अपनी अद्भुत दृष्टि से।
प्रतिशोध का नहीं मात्र, अर्जून का स्वयं से था वह प्रतिद्वंद्व,
स्पष्ट करने जिसे आयें अपने दिव्य रूप में, फिर धरती पर नन्द।
क्यूं विषाद करो तुम जब, कर्म की है बारी,
दुर्बलताओं को दूर कर, अंतिम गंतव्य की यात्रा है जारी।
अपनी इच्छाएं व कर्म ही, है भारी,
परमब्रह्म में सम्मिलित होने के, सभी है अधिकारी।
अपने गुणों के है, सभी आधीन,
सद्, रज तो कहीं, तमो गुण आसीन।
हर बाधा को है लांघना, व्यूह से होना है मुक्त,
कर उद्देश्य को अपने पूर्ण, परम प्रेम के पात्र बनोगे तुम उपयुक्त।
प्रकृति का नियम है परिवर्तन,
जन्म हुआ है जिसका, होगा उसका मरण।
जो बदलता नहीं, वह है अंतर्मन,
वह निर्मल है, मेरा ही एक अंग।
जिसने भी किया चयन - धर्म व प्रेम,
मैं रहा संग उसके, यही है नियति का नेम।
जीवन हो जाएगा आनंदमय, होगा तुम्हारा उद्धार,
यही है गीता का सार - श्रीकृष्ण का उपहार।
By Neetu Saxena

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