गर भटकूँ कभी अपनी राह से मैं
By Abhishek Mehra
गर भटकूँ कभी अपनी राह से मैं,
तू उस राह में बाधा ला देना
मेरी इंसानों सी फितरत में
तू देवों के भाव जगा देना
गर भटकूँ कभी अपनी राह से मैं
तू उस राह में बाधा ला देना
गर मेरे कर्म की भरनी आड़े आए
तू धर्म की राह चला देना
मेरी कथनी करनी के बंधन को
तू सत्य की राह दिखा देना
गर भटकूँ कभी अपनी राह से मैं
तू उस राह में बाधा ला देना
है संभव मैं तुझ को झुठला कर
मन मस्त मगन सा हो जाऊं
संसार की भोग विलासा में
मदमस्त पवन सा इठलाऊं
उस मस्त हवा के झोंके को
तू किसी पर्वत से टकरा देना
कभी सांसो में कभी धुएं में
उस अस्तित्व को मिला देना
गर भटकूँ कभी अपनी राह से मैं
तू उस राह में बाधा ला देना
मैं मानव हूं, मुझ में देवों का भाव नहीं
जहां दिखे स्वार्थ की अभिलाषा
मैं रक्खूं अपनी बात वहीं
तू लाकर जग में मेरी सच्चाई
मुझे खुद की नजरों में उठा देना
गर भटकूँ कभी अपनी राह से मैं
तू उस राह में बाधा ला देना
जग की खुशियों के समंदर में
है संभव मैं तुझको भूलूं भी
है संभव मैं खुद में इतरा कर
तेरे विपरीत अड़कर खेलूं भी
हे ईश्वर मानव हूं मैं
मोह माया में संलग्नित हूं
विशाल धरा इस भूधर में
तेरा भेजा इक वनचर हूं
मेरे भीतर के इस चंचल मन को
तू सख्ती से समझा देना
बन मित्र, माता,पिता या कुछ भी
मुझे सही मार्ग पर ला देना
गर भटकूँ कभी अपनी राह से मैं
तू उस राह में बाधा ला देना
मेरी राह में बाधा आने पर
निश्चित मैं तुझसे रुठूंगा
शायद तेरे दर पर आकर भी
तेरे सन्मुख शीश न धोकूंगा
तू अन्यत्र दिशा में देख कहीं
मेरी गलती को बिसरा देना
मेरे खाली लौटते हाथों में
संयम का प्रसाद थमा देना
गर भटकूँ कभी अपनी राह से में
तू उस राह में बाधा ला देना
तू उस राह में बाधा ला देना
By Abhishek Mehra

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