ग़लत ही सही
By Sanket S. Tripathi
मुझे मालूम है कि मैं गलत हूं, ग़लत ही सही ,
मैंने भी कहा था जमाने से कि तू ग़लत है ,
ये बात ज़माने, क्या ज़मानें से थी तूने कहीं ?
मुझे मालूम है कि मैं ग़लत हूँ, ग़लत ही सही |
हर सड़कों पर इंसानी दिए हर रोज मरते हैं
यहाँ दो वक्त की रोटी मिले, उम्मीदें रोज करते हैं
वहीं तुम स्वाद कम है केह के रोटी थूक देते हो
जिसे थाली समझ कर के ग़रीबी पेट भर्ती है
ग़र तेरी नज़रों को ये सब कुछ लग रहा सही ,
तो जा ज़माने
मुझे मालूम है कि मैं ग़लत हूँ, ग़लत ही सही |
एक वक्त था ज़माने, मुझे तुझ पे भी एेतबार था ,
तुझ से भी ज्यादा, हुआ मुझे भी किसी से प्यार था ,
कर दी मेरे प्यार की हत्या, तरीका आज़माया था वही बिछड़े का वो ज़रूर ये बात तूने कही ही नहीं ,
मुझे मालूम है कि मैं गलत हूं, ग़लत ही सही।
By Sanket S. Tripathi

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