ग़र तुमसे न मिलता
By Sanjay Kumar Upadhyay
धूल में पैदा हुआ परींदा था मैं, धूल में ही रह जाता..!
घरौंदा भी बनाना था इक छाँव में, समझ नही पाता,
.....................................गर तुमसे न मिलता..!!
ज़िन्दगी तो जी ही लेता उन बेख़ौफ़ दरख़्तों की भीड़ में..!
ज़िन्दगी यूं भी खूबसूरत होती है, समझ नहीं पाता,
.....................................गर तुमसे न मिलता..!!
इस कदर भागा , उन खामोशीयों की चीखों से डर के..!
लड़ना और हारना जीतना तो दूर, टूट के बिखर ही जाता,
.....................................गर तुमसे न मिलता..!!
उस चाँद की रोशनी में, खुद के साये से भी जो डरता था कभी..!
अंधेरी रातों में भी परछाईयां साथ चलती हैं, समझ नहीं पाता,
.....................................गर तुमसे न मिलता..!!
सर्द रातों में कम्बल के सुराखों से जो दुनिया देखी थी कभी..!
ख़्वाबों की वो दुनिया, सिमट के खयालों में ही दम तोड़ देती,
.....................................गर तुमसे न मिलता..!!
By Sanjay Kumar Upadhyay

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