ग़ज़ल जब नज़्म लिखती है
By Wamiq Zia
ग़ज़ल जब नज़्म लिखती है, तो सीधे दिल पे लगती है
ग़ज़ल जब गीत गाती है, ख़िज़ाँ में गुल खिलाती है
ग़ज़ल जब भूल जाती है तो कितनी याद आती है
ग़ज़ल मौसम के शानों पर गिरी ज़ुल्फ़ों के जैसी है
ग़ज़ल मिट्टी के खेतों में लगी सरसों के जैसी है
ग़ज़ल गर्मी के आलम में चली पुरवाई हो जैसे
ग़ज़ल जाड़ों के बिस्तर पर पड़ी अंगड़ाई हो जैसे
ग़ज़ल जब खिलखिलाती है, तो हर ग़म भूल जाती है
ग़ज़ल जब मुस्कुराती है, हवा सी झूल जाती है
ग़ज़ल जब छोड़ जाती है, तो कितना वो रुलाती है
ग़ज़ल कोपल से खिलते फूल सी मासूम लगती है
ग़ज़ल ख़य्याम के नग़मों का कुल मफ़हूम लगती है
ग़ज़ल जैसे नमाज़ी की हुई पूरी दुआ कोई
ग़ज़ल जैसे के मंदिर के पुजारी की सदा कोई
ग़ज़ल जब बात करती है, तो ख़ुश्बू साथ चलती है
ग़ज़ल जब हंसने लगती है, तपिश तब घटने लगती है
ग़ज़ल जब रूठ जाती है, तो अश्कों में समाती है
By Wamiq Zia

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