ग़ज़ल-ए-महफ़िल
By Suryam Mittal
एक महफ़िल से गुज़रा था,
जब ज़िक्र चाँद का हुआ, किसी ने कहा ख़ूबसूरत, किसी ने कहा काबिल-ए-दीद,
मैं ज़िक्र तेरा कर आया,
मैं उस महफ़िल से लौट आया
फिर एक दिन बात महबुब की हुई,
कुछ ने बखान अपने इश्क का किया,
कुछ ने उसे शायरी में लिख दिया,
मैं तेरी यादों में ग़ज़लें कह आया,
मैं उस महफ़िल से लौट आया
हाँ में भी उस महफ़िल का हिस्सा था,
कहने को मेरे पास भी एक किस्सा था,
लेकिन उस महफ़िल में अपनी हंसी छोड़ आया,
उस हंसी में अपने आंसू मोड़ आया,
उस महफ़िल को मैं छोड़ आया,
तू चाहे मुझे याद न करे,
न पूछे हाल मेरा,
चाहे मेरा जिक्र भी न करे,
मैं खुदा के दर पर माथा टेक आया,
सिर झुकाया तुझे भुलाने को,
सिर उठाते तेरी सलामती की दुआ मांग आया,
मैं हर महफ़िल में तेरी यादें छोड़ आया...
By Suryam Mittal

Gazals are love
Gazalss ahh great
A very Subtle art