ख्वाब मेरा…..
Updated: Sep 21, 2022
By Anjan Sharma
ख्वाब मेरा…..
आ कह दूं तुझे एक ख्वाब मेरा.....
जीवन के इस रस्ते पर
है बस इतना असबाब मेरा,
कि राहों के कंकड़ पत्थर को,
आदर्श मेरे ही काफी है,
बरसों तक की ये दूरी ,
इन पर चल कर ही नापी है।
ख़्वाब ये है कि जो गिरकर,
हर कतरा लहू भी बह जाए,
प्राण रहे जब तक तन में,
आदर्श मेरे ये रह जाएं।।
दो जोड़ी लज्जा के मैंने
तह करके हैं रखे हुए।
मेरे इस खुले बदन को,
वर्षों से ये ढंके हुए।
जोड़ी में एक उजला सा
और दूजा है चिंदी सा।
कुछ ख़ास नहीं, हैं सोबर से,
जैसे सुहाग में बिंदी सा।
ख़्वाब ये है की जब हारा,
तथाकथित जीतों ने तार तार किया।
उजले अंबर पर जब उनने,
बार बार प्रहार किया।
तब चिंदी ने लाज रखी, ढंककर तब तन मेरा,
नग्न हुआ जब ये शरीर, तब ढांक लिया ज़ेहन मेरा।
ख्वाब ये है की उजले की आस नहीं,
अब चिंदी ही हो अंबर मेरा,
खींचतान अब और नहीं बस,
जो मेरा ,वो हो मेरा।
अब इन ख्वाबों को जोड़कर मैंने,
गठरी एक बना ली है,
एक और कदम एक नया ख़्वाब,
ये बात मैंने अपना ली है।
जो गुज़रो इन गलियों से तो ये,
कह देना संवाद मेरा।
फिर मुलाकात गर होगी जो,
कह दूंगा नया एक ख़्वाब मेरा।
By Anjan Sharma

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