ख्वाब
By Dr. Rohan Prabhakar
यह लहरें ही तो है -
जो दिल में उठकर, बारबार…
न जाने कहाँ समां जाती है।
ख्वाबों को कितनी शिद्दत से जब भी ढूंढा है -
गहराईयों से यूँ निकलकर …
गीली मिट्टी ही हाथ आयी है।
अंकित यहाँ मेरे ही पांव के निशान है -
सहलाता हूँ जिन्हें कुछ देर थमकर …
अस्तित्व उनका आज धुन्दला सा है।
बेबस इन आँखों में, अब न धरती है -
न तो है लहराता सागर!
बस, आह की कुछ… ख़ाली सीपियाँ है।
By Dr. Rohan Prabhakar

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