खेल में जीत और हार
By Abhay Kr. Gaur
खेल में कभी होती है जीत कभी मिलती हार
इतने में ही क्यों दिखाना अरमानों का चित्रहार
हो सके तो खेल को खेल ही रहने दो
खुद को इस तरह रौ में मत बहने दो
क्या एक ही खेल में उगते हैं खिलाड़ी
बाकी खेलने वाले क्या हैं सिर्फ अनाड़ी
सभी खेल खिलाड़ियों का हो एक ही दर्जा
इसमें नहीं होगा किसी को कोई भी हर्जा
मैदान में नहीं रहता सिर्फ एक ही सिकंदर
हर दिन मिलता है नया मस्त कलन्दर
काम उनका, पैसा उनका, वो ही हैं कमाते
हार जीत पे हम क्यों हैं इतना रोते गाते
पैसे का खेल मैदान के खेल से अलग है
इस पर ज्ञान बांटने वाले उससे भी गज़ब हैं
बहुत से हीरे दबे हैं हिंदुस्तान की खान में
चमक बिखेरने को जो बेताब हैं इस जहान में
चाहिए एक सच्चा पारखी, हुनर का कद्रदान
जो इन्हें दे सके उड़ने को खुला आसमान
खेल का लुत्फ उठाओ एक तलबगार की तरह
ना करो हरकतें मरीज़-ए-दिमागी बुखार की तरह
By Abhay Kr. Gaur

Very well said
Your words are fabulous
बिल्कुल सही