खेतों का जुआरी
- Hashtag Kalakar
- Oct 31, 2022
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Updated: Dec 7, 2022
By Abhishek Kumar 'Shahi'
नौकरी की पहली छुट्टी में बेटा घर आया था।नौकरी तो बिहारियों के लिए मोक्ष है ,उसमें भी अगर सरकारी हो तो सशरीर भगवान के दर्शन।वर्दी में ही घर आ गया था। आदमी की कोई औकात नहीं होती ,रौब तो वर्दी में होता है।अब सरकारी अफसर बने हैं तब वो रौब तो दिखना ही चाहिए।किसको मिलती है भला सरकारी नौकरी! आश्विन मास में गिरने वाले अमृत की तरह हैं,टपकना एक बूंद है पर छत पर खीर का कटोरा सबने रखा है और जिनके छत नहीं हैं वो कहाँ रखें भला? अरे ये भी कोई सोंचने की बात है भला! जिनके छत नहीं है उनकी जिंदगी पहले से भारी है, अमर होकर क्या कर लेंगे भला?बाप घर के पास वाले खेत में गुड़ाई कर रहा था। दिन में यूं तो सितारे सूरज की रोशनी में छुप जाते हैं पर इसकी सफेद वर्दी के कांधे पर लगे सितारे रौशनी से चमचमा रहे थे। बाप पर नजर पड़ते ही चरणस्पर्श को लपका। बाप ने दूर से ही रोकते हुए बोला "अरे! हाथ-पैर तो धो लेने दे , मिट्टी लगी है हाथों में ,आशीर्वाद भी नहीं दे पाऊंगा"। "क्या बाबूजी आप अभी तक खेतों में लगे हैं ! क्या उपजता है इसमें भला?फालतू का मेहनत और कौड़ी भाव बिकता है" अफसराना रौब बोल पड़ा। "ये तुम नहीं बोल रहे हो गले में पड़ा फंदा बोल रहा है , गाय-गोरु के गले में जब फंदा पड़ जाता है तो उनको मिट्टी में उपजने वाला घास-भूसा समझ आने लगता है पर आदमी का यही दिक्कत है कि गले में फंदा पड़ते ही खेत-खलिहान सब भूल जाता है"कुदाल के धार को जुबान पर उतार कर बाप बोला। "फंदा नहीं है बाबूजी टाई है ये"। "पगहा(फंदा) शहर जाके टाई बन ही जाता है, जैसे घर का मट्ठा(छाछ) शहर के डिब्बे में बंद होते ही बटर-मिल्क हो जाता है। नजाकत तो है तुम्हारी अंग्रेजी में ,दो कौड़ी के चीज का भी भाव बढ़ा देती है " ,बाप ने व्यंगय से सधे हुए लहजे में कहा। "अरे क्या बहस में लग गए दोनों , सफर से आया है हाथ-मुंह तो धोने दीजिये , आप भी छोड़िए कुदाल ,धूप सर चढ़ रहा है " अफसर साहब की माँ बीच में बोल पढ़ी। अब एक कि मां है दूसरे की पत्नी दोनों आदेश टालने में असमर्थ हैं सो चल दिये घर के अंदर। हाथ-मुंह धोने की देर थी , थाल सज गए व्यंजन से , जो कुछ आता था सब बन दिया, और बने भी क्यों न! बेटा नौकरी से घर आया था। "खाते-खाते बोल पड़ा कहाँ से लाये हैं ये चुकंदर? एकदम खून सा लाल है"। "लाये नहीं है खून-पसीना से उपजाए हैं तभी खून सा लाल है" बाप की किसानी दम भरने लगी। बेटा बात बदलते हुए बोला "अच्छा ये बताइए कैंटीन से फ़्रीज भेजे थे , पैसा भी घर पर छोड़ गए थे फिर क्यों लौटा दिये उसको"? बाप ने सवाल को अनसुना कर दिया पर मां बोल पड़ी " अरे लौटाएंगे नहीं, फ्रिज का पैसा तो धान में लगा दिये और धान बरसात के बिना कोयला हो गया "। बेटे को बल मिल गया उसके तर्क में ,तुरंत बोल पड़ा "इसलिए तो कहते हैं मां ये गांव-खेत छोड़िए शहर चलिए, जितना साल में उपजता है न यहाँ उससे ज्यादा हफ्ते भर का वेतन है मेरा , क्या फायदा फिर मिट्टी में सर फोड़ के।" बाप का तेवर चढ़ गया "देखिये इनको जरा दो दिन से कमाने लगे तो बड़े वेतन वाले हो गए , अपना खेत बंजर छोड़ के बनिए के दुकान का अनाज खाएं हम ! अरे,भगवान लंगड़ा-लुल्हा पैदा करेगा अगले जन्म , कहेगा अपना खेत भी न जोत सकता है फिर हाथ-पैर क्यों ही दें ? तुम्हारी नौकरी तुम तक है , पर ये जीमन पीढ़ियों से हमारे पास है औऱ पीढियों तक रहेगी। हमारा इतिहास है ये ,भगवान परशुराम ने आतातायीयों से छीन कर दी है हमें और नक्सलियों के सामने हथियार उठाकर इसे बचाया है हमने। अरे सीमा पार से कोई एक इंच अपनी जमीन पे न आ जाये इसके लिए सरकार ने लाखों की फ़ौज खड़ी कर रखी है ,तुम्हारे जैसे अफसर बैठा रखे हैं और तुम कहते हो अपना जमीन छोड़ के शहर आ जाएं, जहाँ एक कोने में खाते हो दूसरे में पाखाना करते हो। जानवर रहता है वैसे।" माहौल गरम होते देख मां बोल पड़ी "अरे पानी पीजिए , क्या बच्चे से बहस में लग गए?" बच्चे न रहे अब ये अफसर हो गए हैं , तो अफसर होंगे आपने बटालियन के लिए , इस घर के अफसर हम है ।। बेटा बाप को शांत कराते हुए बोला"अरे आप व्यर्थ गुस्सा हो रहे हैं , वो मतलब नहीं था हमारा , अच्छा छोड़िये ,रहने मत आइयेगा घूमने तो आ सकते है न? " हां ,गेंहु कटने दो घूम लेंगे शहर भी" बाप गुस्सा धीमा करते हुए बोला।
अफसर साहब समझ चुके थे कि पिताश्री को शहर ले जाना मुमकिन नहीं है। बात छेड़ना भी आफत मोल लेने जैसा है। अपने कीर्तिमान की कहानियाँ सुनाने में अफसर साहब के दिन बीतने लगे। यही लुभावनी कहानियां तो रोज लाखों को गांव की गलियों से उठाकर शहर में पटकती है। शहर की तरक्की कोयले के खदान में हीरा मिलने जैसा है , मिला किसी एक को है पर लाखों लोग रोज काले पत्थर पर फोड़ने के लिए भागे आ रहे हैं। इन्ही बातों में छुट्टी निकल गयी । भला कहने को महीने भर की छुट्टी होती है ,बीतती ऐसे है जैसे कल आये हो और आज जाना हो।
समान कांधे पर लद गया , पैर छूते ही मां के आंख सजल हो गए ,रोना तो बाप को भी आता है पर मूंछो का ताव आँसू निकलने नहीं देता । "रोती क्यों है , फिर तो आएंगे ही । फिर से फ्रीज भेज देंगे इस बात मत लौटाना , पुदीने का ठंडा शरबत बना के रखना उसमें , पैसा निकालकर आलमारी में छोड़ दिये हैं, अच्छे से रहना" कहते हुए अफसर साहब निकलने लगे। माँ दहलीज पर खड़ी देखती रही ,बाप बस अड्डे तक पीछे गया।बेटे को भारी मन से विदा करके लौट रहा था कि पीछे से मजदूर बोल पड़ा " मालिक आलू का मौसम हो गया है , पर फायदा नहीं है आलू बोने में । मूंग-बादाम(मूंगफली) लगाइए इस बार, 8-10 हजार का खर्चा है पर 20-22 हजार आ भी जाएगा।" "हां जिसमें फायदा हो वही लगाओ, बेटा कहते रहता है कुछ होता ही नहीं है।" बाप ने फ्रीज के 10 हजार फिर से खेतों में झोंक दिया। सोंचा दो महीने में तो फसल तैयार हो ही जाएगी । पैसा भी आ जाएगा और फ़्रिज तो मुनाफे से आएगा । फसल बड़ी अच्छी हुई थी। खेत तो सोना उगलते ही हैं । भला मुट्ठी भर बीज फेंको ,थोड़ा गोबर-पानी दो और ढाई-तीन महीने में बीज हजारों गुणा फल दे जाते हैं। ऐसा टेक्नोलॉजी खेतों से इतर कहाँ विकसित हुआ है अभी ! धूर्त से धूर्त साहूकार भी महीने भर में ज्यादा से एक टका को चार में बदल पाता है।पर खेती जुआ होता है जिसमें अपना दांव बस बीज बोने तक ही होता है बाकी सारे पासे मौसम और मंडियों के आधीन होते हैं। थोड़ा यज्ञ-हवन करके मिस्री चढ़ा के भगवान को मौसम के लिए तो मनाया भी जा सकता है ,पर मंडी के इन धूर्त शकुनियों के पासों का कोई तोड़ है भला! खेत का सोना व्यापारी की मंडी पहुँचते ही कोयला हो गया। कोयला कहना भी पाप होगा क्योंकि कोयले का भाव भी फसलों से कई ज्यादा था। मुनाफ़े की सोंच रहे थे पूँजी भी नहीं लौटी । बहस करने की कोशिश की तो व्यापारी ने साफ कह दिया यही भाव है जी ,बेचना है तो बेचो नहीं तो घर रखो। घर ले जाकर सड़ाने से अच्छा है कि इसे ही दान कर दो , हमारी हड्डियां गले और इसका तोंद बढे वही सही। यही सोंचकर जो भाव मिला उसमें बेच आया । कमसेकम मजदूरों को उनका बकाया तो मिल जाएगा। पर ये बात मन को बार बार कंचोट रही थी कि तीन दिन में फ्रिज आने वाला है ,अबकी लौटा दिया तो बेटा क्या सोचेंगा। इसी निराशा में किसान आत्महत्या कर लेता है। सही कहता है लड़का कोई फायदा है नहीं खेती में। शहर की चारदिवारी में चार घण्टे मेहनत करता है कोई तो मुनाफे का चार पैसा भी आता है। यहाँ तो सब व्यर्थ जाता है।निराशा उसे निगलने लगी थी। कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। घर जाकर भी क्या कहेगा कि फिर जुए में हार गए , वो भी चार बातें सुनाएगी। यही सोंचकर चबूतरे पर बैठ गया। मन बहलाने के लिए अखबार पढ़ने लगा। मोटे-मोटे अक्षरों में छपा था कि झारखंड के किसी गांव में एक बच्ची ने भूख से भात-भात कहते हुए दम तोड़ दिया। पढ़कर दिल भर आया उसका। अपने आप से कहने लगा अभी ही ये हाल है, हम न उपजाए तो अखबार इन खबरों से भर जाएगा , पूरा देश कालाहांडी हो जायेगा।फिर भी ये पूछते हैं क्या होता है खेतों में! जब खेतों उपजेगा ही नहीं तो फ्रिज में क्या रखेंगे?गमछे से थोड़ा मूंगफली निकाला और तोड़ते हुए खेत की ओर चल दिया। देखा चिड़ियों का एक झुंड गिरे हुए मूंग और मूंगफली के दानों को चुग का खुशी से चहचहा रही थी। बाप मजदूर से बोला "देखो कारू! जिस दिन खेत बंजर हो जाएगा इंसानो के साथ ये चिड़िया भी भूख से मर जायेगी। " उन चिड़ियों के साथ उसका मन भी चहचहाने लगा। मजदूर बोल पड़ा" मालिक इस बार गन्ना लगाइए ,छोटे मालिक आएंगे तो इस गर्मी में ठंडा रस तो पीने मिलेगा। शहर में पैकेट वाला जूस पीते होंगे ,उसमें क्या रहता है कौन जाने।" दोनों हंसने लगे। चिड़िया और जोर से चहचहाने लगी। मंडियों में जो मनाफ़ा लूटा गया था वो उसे खेतों पर वापस मिल गया।
By Abhishek Kumar 'Shahi'

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