खुसकिस्मती
By Sheikh Wasim Mustafa (Sheikh Sahab 007)
खुसुसी इसी में थी के
मैं कभी लौट कर न अता
तेरा इल्म भी कमाल का है
जो हर बार लौटा लाता
मैं ठहरा एक शाम जो
कभी लौट के नहीं आता
मैं मुसाफ़िर भटका हुआ
तेरा पता कहां से लाता
मेरी ख्वाहिशें ऐसी थी
के कैसे लौट कर आता
गर आता हारे हुए
तो सारा जग रूठ जाता
तेरी दूआओं का ही असर है
जो हर बार लौटा लाता
मेरा खुदा भी रूठ जाता
गर में लौट कर न अता ।
By Sheikh Wasim Mustafa (Sheikh Sahab 007)

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