खुदसे मुलाकात...
- Hashtag Kalakar
- Sep 24, 2022
- 3 min read
Updated: Oct 8, 2022
By Keyur Joshi
कल नींद कुछ देर से खुली
वह चिड़िया जो रोज़ मेरी खिड़की पर दस्तक देकर मुझे जगाती थी, न जाने क्यों अपनी रिवायत छोड़ आई ही नही...
बारिश की बूंदों को उस खिड़की की कांच पर टकराता सुन मेरे पाँव ज़मीं पर पड़े ही थे के उस एक काले बादल को मेरे घर की तरफ़ बढ़ता देखा...वह दिन कुछ अलग था...जैसे समय कट ही न रहा हो...
मेरी माँ को आदत है सुबह radio सुनने की...
रोज़ की तरह आज भी गाने चल रहे थे के तभी एक गाना शुरू हुआ...वह एक गाना जो दिल के बहुत करीब था पर न जाने क्यो मुझे उसके लफ्ज़ात आज मेरे बीते कल की तरफ ले जा रहे थे...
"तेरी नज़रों में है तेरे सपने
तेरे सपनों में नाराज़ी
मुझे लगता है के बातें दिल की
होती लफ़्ज़ों की धोखेबाज़ी..."
वह बीता कल, वह हारा इश्क़..
वह इश्क़ हारा था, या उसे फरामोश कर दिया ?
अगर हारा था, तो जीता कौन ?
और गर भुला दिया, तो क्या इश्क़ का कोई वजूद भी था ?
कुछ सवालों के जवाब नहीं होते...
क्या याद होगा उसे वह रोज़ जब मैं साइकिल से गिर पड़ा था..
जो ज़ख्म हुआ, बड़ा आम था,
उसपे तवज्जों देने का न कोई काम था...
तब जो पैर मेरी जानिब दौड़ कर आए वो उसी के थे,
मेरी कोहनी पर हुए उस ज़ख्म का एहसास उसी ने करवाया था,
उन आँखों से छलकनेवाले जाम भी उसी के थे,
और उस छोटी खरोंच पर बंधा रुमाल भी उसी का था...
क्या वो प्यार सच था ?
अगर था तो मेरे ज़ख्म क्यो खुले है ?
और गर नही था, तो वो आंसू क्यो बह गए ?
क्या सच है, क्या झूठ है
न उसे खबर है, न मुझे पता है
इस दिल-ओ-दिमाग की जंग में कौन नही रोते ?
कुछ सवालों के जवाब नहीं होते...
मैं अक्सर अपना इश्क़ उसे जताया करता था,
जिसका जवाब वो बस अपनी पलकें झुकाए, हल्की सी मुस्कान पहने दे दिया करती थी, मगर वो रोज़ कुछ अलग था
आखिरी मुलाकात की मुझे कोई खबर नही थी
उसने बस कह दिया के सुनो, अब कोई इश्क़ नही तुमसे,
बस अब बहुत हुआ, अलग हो रही हूँ सबसे...
मेरी ज़मी मानो धसती चली गई,
मेरी सांसें मानो एकदम से थम गई..
भुला देना अब मुझे उसका बस इतना कहना था,
यादों को याद कर, अब मुझे जीना था..
वो यादें जो रुलाती है, उन्हे याद करना गलत है क्या ? आखिर यादें तो यादें होती है...
उन्हें याद करना अगर गलत है तो उसे हसता हुआ याद करके खुदको बेबस करना सही है क्या ?
और उन शीरीं लम्हो से इख़्तिलात रखना गलत है तो उसे यूं नज़रो से ओझल होते देखना सही है क्या ?
खुदपर इल्ज़ाम लगाना सही है क्या ?
मुझे बताओ, इश्क़ करना गलत है क्या ?
इस सही और गलत के बीच होता क्या है ?
यह सही और गलत आखिर होता क्या है ?
खैर अब रातों को जगना बादस्तूर है,
अपने इश्क़ पर अब ना कोई गुरूर है
आँख लग गई मेरी ये सोचते सोचते,
के कुछ सवालो के जवाब आखिर क्यो नही होते...
उस रात एक शख्स आया था मेरे ख्वाबों में,
कमीज थी कुछ मुझसी,
चश्मा उसने भी पहना गोल था,
हाँ, शायद वो मैं ही था...
उस मैं ने कुछ कहा मुझसे,
सोचो क्या खो रहे हो खुदसे
सवाल तुम्हारे जायज़ है,
पड़े तुम्हारे पास कुछ कागज़ है
खुशनसीब हो तो जवाब मिलते है,
वरना कुछ राज़ तो राज़ ही अच्छे है...
यूँ रोज़ लड़कर खुदसे शायद जवाब ढूंढ भी लोगे तुम,
लेकिन खो कर अब खुदको, बताओ क्या उसे फिर पाओगे ?
आज नींद कुछ जल्दी खुली...
वो चिड़िया जो कल कहीं चली गई थी, आज फिर मेरी खिड़की पर लौट आई है...
बारिश की बूंदें आज भी उस खिड़की पर टकरा रही है, पर मेरे सवालों के बादल अब नज़र नही आ रहे...
हाँ, शायद मुझे मेरे जवाब मिल गए...
शायद, आज मुलाकात खुदसे हो गई...
एक सुकून मिला जब radio आज कह गया,
"तुम साथ हो, या न हो, क्या फर्क है,
बेदर्द थी ज़िन्दगी, बेदर्द है......"
By Keyur Joshi

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