खुद ही रूठती है
By Nisha Dudi
खुद ही रूठती है
खुद की मान भी जाती है
छोटी छठी बातों पर रो देती है
बढ़ती बातों को मुस्कुरा का सह जाती है
लिखती है कविताऐं
ओर उनको बार-बार दोहराती है
सुनती है पुराने गाने
ओर साथ में गुनगुनाती है
कभी कभी बालों को खुला छोड़
हवा में लहराती है
फिर जब वही बाल मुंह पे आ लागे
तो झट से उनका जुड़ा बनती है
कभी कभी एक कॉफी के कप को
हाथ में लिए घंटे भर ऐसे ही बैठ जाती है
हर रोज आसमान को निहारती रहती है
पर जब तेज हवा का झोंका आए तो
तो आंखे बंद कर उसको महसूस कर
एक अलग ही शांति पाती है
बस ट्रेन के किसी कोने में बैठ कर
ना जाने क्या लिखती जाती है
जब किताबे पढ़ती है
ओर उनको कहानियों में खो जाती है
और को काफ़ी हंसाती है
खुद भी छोटी छोटी बात पर खिलखिलाती है
बारिश में आज भी
कागज़ की कस्ती को तेरा ती है
सोचती बहुत कुछ रहती है
पर आधी अधूरी चीजें ही पूरी कर पाती है
फ़िर भी नए नए काम सीखना जो चाहती है
दिवाली में रंगोली बनती है
होली में गुजिया खिलाती है
कभी कभी आंखों में सुरमा
ओर माथे में काली बिंदी लगाती है
एक हाथ में घड़ी ओर एक में चूड़ियां पहनी नज़र आती है
सुनहरे किनारे की सफ़ेद साड़ी पहन
कई घंटों तक इतराती है
बालों में गजरा लगा कर
सीसे में खुद को देख कर बहुत मुस्कुराती है
जो शायरी गजलों में खुद को महसूस कर पाती है
जो शादी करने से पहले
खुद के पैरों पर खड़ी होना चाहती है
जो खुद की आवाज दूसरी के लिया
कभी नहीं दबाती है
जो दुनिया फर से
सही बात के लिए लड़ जाती है
जो समुद्र में उड़ाना और
पहाड़ों में तैरना चाहती है
जो गहरी बातों को भी
सरल कर जाती है
ओर सरल बातों को
जटिल बना जाती है
जो नए जमाने में
अपने पुराने तरीके से अपनी कहानी लिख पाती है
बहुत खुशी होती है जब देखती हु लड़कियों को
जो ये तमाम चीजें करती लड़कियां नज़र मुझको आती है
By Nisha Dudi

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