खुद टूट कर
By Diwakar Sharma (Rikhadi)
मैं खुद टूट कर
अब टूटे लोगो को जोड़ता हूँ
सबकी खूबिया हु देखता
बेमतलब सबके गुरूर को छेड़ता हूं
किसी को किसी का खलल है
तो किसी को अपनी ही किसी चीज़ का मलाल
कोई खुद को कमज़ोर है समझता
कोई खुद ही को जिंदगी का काल
मशक्कत कर रहा रोज़ यूं
कोई खुद ही से खफा है
पर अचंभा है मुझको
सब में मोहब्बत बे-पनाह है
मैं खुद टूट कर
अब टूटे लोगो को जोड़ता हूँ
हंसी मिले दो पल तो
घंटो तक कोई रोता है
जैसे ख़ुशी महज़ सौबत का
एक हसीन धोखा है
लाज नहीं रहती अब
अश्क नहीं बहते है
खुद ही के खामियाजो में
सब आत्मा-संग सहते हैं
मैं खुद टूट कर
अब टूटे लोगो को जोड़ता हूँ
लगा मरहम हर दर्द पर
समेट सभी की बातें
फ़िर ज़ख्म को कुरेद कर
तरसता हूं घोट कर खुद ही की सांसें
फ़िर रख सिर अपने तकिये पर
खुद ही से मुँह मोड़ता हूँ
बतियाता तो हूं जहान से मैं
खुदमे चुप्पी थामी है
कोई अगर पूछे तो कह देता हु
बस यही मेरी कहानी है!
By Diwakar Sharma (Rikhadi)

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