खिड़की भर धूप
By Abha Vishwakarma
सुबह - सुबह
खोलती हूँ मैं खिड़की
कमरे में आने के लिए
खिड़की भर धूप
जिसके साथ
आता है भीतर
हँसुली जैसा चाँद
नीला आसमान, हवा
घास की हरितिमा
हरे-भर पेड़ पौधे
रंग- बिरंगे फूल पत्तियाँ
पक्षियों का कलरव
बरसात की पहली बौछार
जेठ की दुपहरिया
और
जाड़े की कड़कती ठंड
जो सब खिड़की जितना होता है ।
खिड़की के खुलने पर
कमरे के भीतर से
जाता है बाहर
खिड़की भर अंधेरा
जो अपने साथ लिए होता है
दु:ख, दर्द, वेदना, संताप
अकेलापन,असुरक्षित भविष्य
और अंधेरे से लगने वाला डर ।
हर रात
मैं बंद कर लेती हूँ मैं खिड़की
पुन:
सुबह खोलने के लिए
ताकि,
भीतर आ सके कमरे में
खिड़की भर धूप
और बाहर जा सके कमरे से
खिड़की भर अंधेरा ।
By Abha Vishwakarma

Nice one
Enjoyed reading...
Wonderful
A well expressed and thoughtful poem - which clearly brings out the visuals!
Could visualise and feel the importance of a window in every phase of our life.