खाली हाथ
By Kavita Sharma
जब खाली हाथ जाता हूँ
घर से बेधखल कर दिया जाता हूँ
मिलता है सिर्फ सन्नाटा मुझे
ज़ब गलियों से गुजरता हूँ
कहा करू अपने खालीपन को दूर
अपने हीं घर मे, मैं घर ढूंढता हूँ
कांच की तरह टूट जाता हूँ
जब घर के दरवाजे बंद देखता हू
सोचता हूँ कैसे खरीदू ?
जब रिश्तो के महगे दाम देखता हूँ
वाह! सुन्दर है घर की दीवारे
मेले मन देख कर,
मैं यु झूठ बोलता हू
जब खाली हाथ जाता हूँ
या सच बोलता हूँ,
घर से निकाल दिया जाता हूँ
By Kavita Sharma

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