खामोशी और खुशियाँ
Updated: Jul 19, 2025
By Sarthak Gupta
इतने सारे लोगों की मौजूदगी में भी इस दिल के लिए सब तनहा सा है
किसी से बाँटा नहीं जा सकता थे दर्द
क्योंकि मेरे पास होकर भी ये दिल जुदा-जुदा सा है।
दर्द ऐसा है दिल में कि चाहकर भी किसी से बाँटा नहीं जा सकता
मजबूरी है या जिद कि ना चाहकर भी
बांध रही खामोशी है
दिल में दर्द चेहरे पर मुस्कुराहट लिए
चला जा रहा राही ये।
आवाज़ आई दिल से कि
दूब जा नई खुशियों के ऊबालों में
पर पड़ा रहा यह उन्हीं अंधेरों में
ना जा पाया ऊजालों में।
अपनी दर्द भरी खामोशी के समंदर में
यह राही डूबता चला गया
तैरकर वापस ना आया और
यूँही मुरझाता चला गया।
आवाज आई दिल के एक कोने से कि
छोड़ इस दर्द को, छोड़ इस खामोशी को और पकड़ खुशियों की ट्रेन
भुला दें इन सारे ग़मों को
आखिर कब तक बढ़ाएगा दुःखों का रेट।
उस दर्द और खामोशी के स्टेशन को छोड
पकड़ ली उस राही ने खुशियों की ट्रेन
पहुँचा वो मंजील पर जहाँ मिली उसे
उसकी खुशियाँ और ढ़ेर सारा प्रेम।
अब खुश है वो राही
बे वजह बह रहा था दुःख भरे समंदर की लहरों में
बाहर आकर देखा तो कुछ नहीं रखा था
उस दुःख भरे कोहरे में।
तू भी बन उस राही की तरह,
ना फ़स दुःखों के जंजाल में
उड़ जा तु भी इस संसार में
जहाँ खुशियाँ बहती हैं इन
खुशबूदार ताजी हवाओं में।
By Sarthak Gupta

Comments