खामोशियों का शहर
- Hashtag Kalakar
- Dec 2, 2025
- 1 min read
By N Veyra
मैं वहाँ गया,
जहाँ लोग अपने खुद के साये से भी डरते हैं।
शायद वहाँ प्यार नहीं है,
शायद वहाँ उम्मीदें भी नहीं हैं,
शायद वहाँ कोई कुछ भी नहीं होता।
मैंने किसी को देखा,
जिसका नाम हवाओं में गुम हो चुका था।
कभी था,
फिर नहीं था।
याद आई मुझे उसकी,
एक पल, दो पल,
फिर खुद को याद दिलाया —
याद रखना भी एक अपराध है।
और फिर सब कुछ बह गया,
जैसे नदी अपने किनारे भूल जाती है।
भुला देता है इंसान,
भुला देता है समय,
और जो सच में कोई था,
वो भी खो जाता है,
कहीं,
जहाँ नाम का कोई ठिकाना नहीं।
पर फिर भी,
मैं खड़ा हूँ,
उस अधूरी खामोशी में,
सुन रहा हूँ अपने खुद के हृदय की आवाज़।
क्योंकि कभी-कभी,
जब कोई याद नहीं करता,
तभी इंसान सबसे ज़्यादा महसूस करता है कि उसने कभी महसूस किया था।
By N Veyra

Good
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Write on positive aspects of life as well.
Grounded
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