खामोश डर
By Vandita Kumari
ख़ामोश थे लब्ज़ पर नज़रें कुछ कह रही थी
बताना था बहुत कुछ जाने किससे डर रही थी!!
इंसानियत आज फिर दर्द से आहें भर रही थी
होठों की चुप्पी भी शोर बहुत कर रही थी!!
दिल मर्माहत था और ज़ख्म हरे कर रही थी
सबकी सांत्वना दिल को छलनी कर रही थी!!
न जाने वो अब बातें किससे कर रही थी
बताना था बहुत कुछ जाने किससे डर रही थी!!
By Vandita Kumari

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