ख़्वाबों का हिंदुस्तान
By Devina Gupta
ख़्वाब मैंने देखे हैं एक हिंदुस्तान के लिए,
जहां आज़ादी की क़ीमत ज़िंदगी नहीं देती,
इंसानियत सरहदों की बंदिशों में नहीं सिसकती,
जहां भूख सड़क पर भीख नहीं माँगती,
जहां मजबूरी जिस्म का बाज़ार नहीं लगाती,
महज़ाब केवल जहां एक पहचान नहीं रह जाता,
जीना ही एक सवाल नहीं बन जाता ।
मुझे नहीं मालूम की दर्द किसे कहते हैं,
मेरी ख़्वाबों के दायरे में यह लफ़्ज कहा रहते हैं,
बिखरे हाथ, बुझीं आँखें,
लहूँ का रंग, प्यासी साँसे,
दबी आवाज़, नंगी छाथी,
बेरोज़गारी, बेगारी,
कही नक्सलवादी, कही अंतकवादी,
यह सब केवल शब्दों में ढल जाते हैं,
मुझे अपना सच दिखा कर, मेरे ख़्वाबों को ले जाते हैं ।
नहीं समझ आती मुझे अपनी ही मिट्टी,
जोह कभी भगवा, कभी हरी में बिकती,
कभी क़ौमवादी, कभी जातिवादी,
में अपना वजूद हैं पिसती ।
किसको अपना वतन कहूँ,
जहां शब्दों में भी व्यापार होता हैं,
चिन्हों में आदमी अपना वजूद खोता हैं,
धर्म का सौदा करवाता हैं,
और आज़ाद हिंदुस्तान राष्ट्रवाद का ग़ुलाम बन जाता हैं ।
ख़्वाब फिर भी देखे हैं मैंने मेरे हिंदुस्तान के लिए,
पर अब वो सिर्फ़ आरज़ू से लगते हैं,
इसी बिखरी साँसो में खो कर,
वो मुझ से सवाल करते हैं,
जब तुम चुप हों,
तो क्यूँ इस देश को अपना बताते हों,
जब कुछ बदल नहीं सकते,
तो क्यों ख़्वाबों को ही झूठा बताते हों ।
By Devina Gupta

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