ख़्वाब
By Jagrati Chaurasiya
ख़्वाब के नगर में चांद के शहर में आ पहुंचे।
न ख़बर हुई न एहसास की ख़्वाब के इतने करीब आ पहुंचे।
कदम बढ़ाते गए और ख़्वाब पर नज़र जमाते गए।
आख़िर सफ़र ख़्वाब का था या चांद का ये कहां सवाल रह गया।
जब ख़्वाब के नगर में आ पहुंचे तो
फिर किस बात की फ़िक्र ख़्वाब और चांद दोनों ही हमारे हिस्से में आ पहुंचे।
पता नहीं क्यों आंखों में अश्क छलक गए।
पैरों को देखा तो जाना उनमें छाले पड़े गए।
न ख़ुद का ख़्याल था, न पथरीली ज़मीन से आहत होने की चिंता।
लक्ष्य तो ख़्वाब था फिर कैसे कुछ दिखाई दे पाता।
आंखों में चमक और मन में सुक़ून था।
क्योंकि राहों को भरपूर जीया था हमनें
और उन पर चलकर हम अपने ख़्वाब तक आ पहुंचे।
By Jagrati Chaurasiya

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